रविवार, 30 अगस्त 2015

ग़ज़ल: ग़र्क होकर भी उभर सकता हूँ मैं

आपकी इमदाद कर सकता हूँ मैं    (इमदाद = सहायता, मदद)
अपने पर खुद भी क़तर सकता हूँ मैं

जिस्म ही थोड़ी हूँ मैं इक सोच हूँ
गर्क हो कर भी उभर सकता हूँ मैं

इक फकत कच्चे घड़े के साथ भी
पार दरिया के उतर सकता हूँ मैं

बाँध कर मुट्ठी में रखियेगा मुझे
खोल दोगे तो बिखर सकता हूँ मैं

कह तो पाऊँगा नहीं कुछ फिर भी क्या
आप से इक बात कर सकता हूँ मैं


 -राजीव भरोल 

सोमवार, 10 नवंबर 2014

ग़ज़ल: अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं.

दीपावली के अवसर पर श्री पंकज सुबीर जी द्वारा आयोजित, तरही मुशायरे में कही गई मेरी यह ग़ज़ल, आप सब की नज्र:


उसे उसी की ये कड़वी दवा पिलाते हैं,
चल आइने को ज़रा आइना दिखाते हैं.

गुज़र तो जाते हैं बादल ग़मों के भी लेकिन,
हसीन चेहरों पे आज़ार छोड़ जाते हैं.
(आज़ार = दर्द/तकलीफ़)

खुद अपने ज़र्फ़ पे क्यों इस कदर भरोसा है,
कभी ये सोचा की खुद को भी आजमाते हैं?
(ज़र्फ़ = सामर्थ्य/capacity)

वो एक शख्स जो हम सब को भूल बैठा है,
मैं सोचता हूँ उसे हम भी भूल जाते हैं.

अगर किसी को कोई वास्ता नहीं मुझसे,
तो मेरी ओर ये पत्थर कहाँ से आते हैं.

तुम्हारी यादों की बगिया में है नमी इतनी,
टहलने निकलें तो पल भर में भीग जाते हैं.

तेरी चुनर के सितारों की याद आती है,
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं.

अब इस कदर भी तो भोले नहीं हो तुम 'राजीव',
तुम्हें भी सारे इशारे समझ तो आते हैं.



बह्रे मुज्‍तस मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ
मुफायलुन फयलातुन मुफायलुन फैलुन (1212 1122 1212 22)

गुरुवार, 7 अगस्त 2014

ग़ज़ल: मगर फिर भी हम मुस्कुराते बहुत थे

मुख़्तसर सी एक पुरानी ग़ज़ल आपकी समाअतों की नज्र..

वतन, गाँव, घर याद आते बहुत थे
मगर फिर भी हम मुस्कुराते बहुत थे

मेरे क़त्ल का शक गया दोस्तों पर
वही मेरे घर आते जाते बहुत थे

सराबों को वो सामने रख के अक्सर
मेरी तिश्नगी आज़माते बहुत थे
(सराब=मृगतृष्णा, तिश्नगी=प्यास)

हम अपने ही घर में सवालों के डर से
परेशानियों को छुपाते बहुत थे

था जब तक ये ईमान का बोझ सर पे
क़दम जाने क्यों लड़खड़ाते बहुत थे


-राजीव भरोल 

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

ग़ज़ल: प्यास का कोई यहाँ हल नहीं होने वाला

प्यास का कोई यहाँ हल नहीं होने वाला
सहरा सहरा है ये बादल नहीं होने वाला
(सहरा = रेगिस्तान)

सायबाँ होंगे कई मेरे सफ़र में लेकिन
कोई साया तिरा आँचल नहीं होने वाला
(सायबाँ=छाया देने वाले)

इश्क़ के दावे मुहब्बत की नुमाइश होगी
कैस जैसा कोई पागल नहीं होने वाला
(कैस=मजनू का असली नाम)

मुझको आँखों में बसाने की ये ज़िद छोड़ भी दे
एक काँटा हूँ मैं काजल नहीं होने वाला

मुझको चौखट की और इक छत की ज़रुरत है बहुत
घर मेरा वरना मुकम्मल नहीं होने वाला

आँख भर देख लो दुनिया के मनाज़िर कि यहाँ
आज दिखता है जो वो कल नहीं होने वाला
(मनाज़िर=नज़ारे)


राजीव भरोल

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

ग़ज़ल: जुनूने शौक़ अगर है तो हिचकिचाना क्या

जुनूने शौक़ अगर है तो हिचकिचाना क्या
उतरना पार या कश्ती का डूब जाना क्या
(जुनूने शौक़ = कुछ प्राप्त करने का पागलपन)


हमारे बिन भी वही कहकहे हैं महफ़िल में
हमारा लौट के आना या उठ के जाना क्या

यही कहा है सभी से कि ख़ैरियत से हूँ
अब अपना हाल हर इक शख्स को सुनाना क्या

दिखाने को तो दिखा दूं मैं दिल के ज़ख्म मगर
मैं सोचता हूँ तेरा ज़र्फ़ आज़माना क्या
(ज़र्फ़ = सामर्थ्य/Capacity)

मुझे तो हिज्र के सदमों ने कर दिया पत्थर
तुम्हें भी भूल गया है गले लगाना क्या
(हिज्र = जुदाई)

तुम्हारे ओंठों पे रक्सां है तिश्नगी अब भी
बना दिया है समंदर ने फिर बहाना क्या
(रक्सां = नृत्यमग्न/Dancing, तिश्नगी = प्यास)

जो दिल में है वही चेहरे पे हो तो बेहतर है
दिखावे के लिए बेवज्ह मुस्कुराना क्या

दिलों के राज़ दिलों में सहेज कर रखिये
हर आशना को भला राज़दां बनाना क्या
(आशना = जान पहचान वाला, राज़दां = जिससे राज़ सांझा किये जाएँ)

जब अपनी जीत में अपनों की हार शामिल हो
तो ऐसी जीत पे ऐ दोस्त मुस्कुराना क्या

न जाने कौन सी मिट्टी के तुम बने हो 'भरोल'
तुम्हारा अब भी है उस घर में आना जाना क्या

- राजीव भरोल

बह्र : मफ़ाइलुन फ़यलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन (1 2 1 2 -1 1 2 2 – 1 2 1 2 – 2 2)

शनिवार, 23 नवंबर 2013

ग़ज़ल: बतला रहा हूँ यूं तो मैं सब कुछ सही सही

बतला रहा हूँ यूं तो मैं सब कुछ सही सही
तफ़सीले-वाक़यात मगर फिर कभी सही
( तफ़सीले-वाक़यात = Details of the events)

उसने कबूतरों को भी आज़ाद कर दिया
ख़त की उमीद छोड़ दी मैंने रही सही

वैसे तो कहने सुनने को कुछ भी नहीं मगर
मिल ही गये हैं आज तो कुछ बात ही सही

उसके भी ज़ब्तो-सब्र का कुछ एहतराम कर
जिसने तमाम उम्र तिरी बेरुख़ी सही
( ज़ब्तो-सब्र = Self control and patience, एहतराम = Respect)

इस दिल का ये मरज़ तो पुराना ही है हुज़ूर
तशखीस इस मरज़ की भले ही नयी सही
( तशखीस = Diagnosis, मरज़ = बीमारी)
 
मक़सद तो दिल का हाल जताना है दोस्तो
गर क़ूवते-बयान नहीं, खामुशी सही
 (क़ूवते-बयान = Power to express yourself, मक़सद = Goal)

पत्तों का आँधियों में बिखरना नया नहीं
इस बार आँधियों की वज़ाहत नयी सही
( वज़ाहत = Explanation)

हम आपके बग़ैर जिये और ख़ुश रहे?
अच्छा ये आप समझे हैं? अच्छा यही सही

मन का पपीहा प्यासा का प्यासा ही रह गया
क़िस्मत में इसकी प्यास ही लिक्खी हुई सही


आर बी राज़
(बह्र: मफ़ऊल फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ाइलुन 1 1 2 1 -2 1 2 1- 12 2 1- 2 1 2)

मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

ग़ज़ल: आईना ही जब झूठा हो जाता है.

आईना ही जब झूठा हो जाता है.
तब सच कहने से भी क्या हो जाता है.

अम्न की बातें इस माहौल में मत कीजे,
ऐसी बातों पे झगड़ा हो जाता है!

आँगन में इतनी बारिश भी ठीक नहीं,
पाँव फिसलने का खतरा हो जाता है.

मिलना जुलना कम ही होता है उनसे,
बात हुए भी इक अरसा हो जाता है.

आओ थोड़ा झगड़ें, कुछ तकरार करें,
इन सब से रिश्ता गहरा हो जाता है.

इतनी सी ये बात कोई समझा ही नहीं,
जिसको अपना लो, अपना हो जाता है.

जी भारी भारी सा है, रो लेते हैं, 
रो लेने से जी हल्का हो जाता है.

जादू है कुछ चारागर के हाथों में,
ऐसे थोड़ी दर्द हवा हो जाता है!

वक़्त सुखा देता है नदिया, ताल सभी,
धीरे धीरे सब सहरा हो जाता है.

-राजीव भरोल 

सोमवार, 23 सितंबर 2013

ग़ज़ल: मैं उलझा रहा अपने किरदार में

यहीं, बीवी बच्चों में, घरबार में,
मैं उलझा रहा अपने किरदार में.

जो 'कुछ-लोग' चाहेंगे, होगा वही,
छपेगा वही कल के अखबार में.

अँधेरों से सूरज के घर का पता,
यूं ही पूछ बैठा मैं बेकार में.

अजी छोड़िये बातें ईमान कीं,
हरिक चीज़ बिकती है बाज़ार में.

ख़ुशी ढूँढता है ये नादान मन,
कभी नफ़रतों में, कभी प्यार में.

है इक फ़लसफ़ा ज़िन्दगी का निहाँ,
इन्हीं ज़र्द पत्तों के अम्बार में.


-- आर बी

रविवार, 25 अगस्त 2013

ग़ज़ल: देखा जाए तो भला चाहती है.

देखा जाए तो भला चाहती है,
मेरी बीमारी दवा चाहती है.

खुद से बेज़ार हुआ चाहती है,
तीरगी एक दिया चाहती है.
(तीरगी = अँधेरा, बेज़ार = Dissatisfied)

कितनी आसाँ है हयात उनके लिए,
जिन चरागों को हवा चाहती है
(हयात = ज़िन्दगी)

डांटती है भी, तो अच्छे के लिए,
माँ है, वो थोड़ी बुरा चाहती है.

फिर से बहनों के पुराने कपड़े?
बच्ची सामान नया चाहती है!

आँधियों में भी जो रौशन हैं चराग.
इसलिए हैं, कि हवा चाहती है!

इश्क़ बुनियादी ज़रुरत है मियां,
इक तवायफ़ भी वफ़ा चाहती है.

-आर बी राज़.

बुधवार, 24 जुलाई 2013

ग़ज़ल: जाने क्या चाहती है याद उसकी

कब मुझे रास्ता दिखाती है,
रौशनी यूं ही बरगलाती है.

शाम ढलते ही लौट जाती है,
वैसे इस घर में धूप आती है.

अक्ल, बेअक्ल इस कदर भी नहीं,
फिर भी अक्सर फरेब खाती है.

जाने क्या चाहती है याद उसकी,
पास आती है, लौट जाती है.

रब्त हमको है इस ज़मीं से, हमें,
इस ज़मीं पर ही नींद आती है.

मांगता हूँ मैं खुद से खुद का हिसाब,
बेखुदी आइना दिखाती है.

किस से क्या बात कब कही जाए,
ये समझ आते आते आती है.

बात कड़वी है जाने दे, अक्सर,
बात बढ़ती है, बढ़ती जाती है.

-आर बी राज़.

बुधवार, 3 जुलाई 2013

ग़ज़ल: उस उम्र में था मेरा हर फलसफा गुलाबी

श्री पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर आयोजित होली के तरही मुशायरे में कही गई गज़ल पेश है...

आँखों में थे सितारे, हर ख़ाब था गुलाबी,
उस उम्र में था मेरा हर फलसफा गुलाबी.

मौसम शरारती है मेरी निगाहों जैसा,
है हर गुलाब तेरे, रुखसार सा गुलाबी.

फूलों को बादलों को, हो क्यों न रश्क आखिर,
गेसू घटाओं जैसे, रंग आपका गुलाबी.

बदला है कुछ न कुछ तो, कुछ तो हुआ है मुझको,
दिखता है आज कल क्यों, हर आइना गुलाबी.

होली का रंग है ये, कह दूंगा मुस्कुरा कर,
पूछा जो उसने क्यों है, चेहरा मेरा गुलाबी.



-आर.बी. 'राज़'

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

ग़ज़ल: नए साल में नए गुल खिलें, नई हो महक नया रंग हो

मित्रगण,
श्री पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर आयोजित नववर्ष के तरही मुशायरे में पिछले वर्ष कही गई गज़ल पेश है...


नई सोच हो नया आसमां
, नए हौसलों की उमंग हो,
नए साल में नए गुल खिलें, नई हो महक नया रंग हो.

मेरे दर पे आये फ़कीर को मेरी झोंपड़ी से न कुछ मिले,
मेरा हाथ ऐ मेरे आसमां कभी इस कदर भी न तंग हो,

कई दिन हुए मैं उठा नहीं, जा के पर्वतों से भिड़ा नहीं,
मेरे हौसलों में पड़े पड़े ही न लग गया कहीं ज़ंग हो.

तेरे तल्ख़ लहज़े कि चोट से किसी दिल का कांच चटख गया,
कहाँ लाज़िमी है तू हाथ ही में लिए हुए कोई संग हो?

मैं बुलंदियों की मिसाल था, मेरी ईंट ईंट बिखर गई,
है उरूज तो है जवाल भी, मुझे देख कर यूँ न दंग हो.

-आर.बी. 'राज़'

शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

तुम्हारे साथ मियाँ हादसा तो हो कोई


समाअतों का यहाँ सिलसिला तो हो कोई,
चलो गिला ही सही, इब्तिदा तो हो कोई.

है इंकलाब ही इस दौर की ज़रूरत अब,
पर इन्कलाब यहाँ चाहता तो हो कोई.

मैं आसमान उसे कह भी दूं मगर उसका,
बुलंदियों से कहीं वास्ता तो हो कोई.

मिलेगी तुमको भी सरकार से मदद लेकिन,
तुम्हारे साथ मियाँ हादसा तो हो कोई.

चलेगा कौन यहाँ सच के साथ? पहले यहाँ,
बिना सहारे के सीधा खड़ा तो हो कोई,

-आर.बी.'राज़'

शनिवार, 9 जून 2012

कोई झोंका तुझे छू कर गुज़र जाए तो अच्छा हो.


तेरी खुशबू फिज़ाओं में बिखर जाए तो अच्छा हो,
कोई झोंका तुझे छू कर गुज़र जाए तो अच्छा हो.

कई दिन से तसव्वुर आपका मेहमां है इस दिल में,
ये मेहमाँ और थोड़े दिन ठहर जाए तो अच्छा हो.

सफर की मुश्किलों का यूं तो कुछ शिकवा नहीं फिर भी,
मेरी मंजिल का हर रस्ता संवर जाए तो अच्छा हो.

कफस में ही अगर रहना है तो उड़ने की हसरत क्यों,
कोई आकर मेरे ये पर कतर जाये तो अच्‍छा हो.

बहुत रुसवा हुआ हूँ मैं यहाँ सच बोल कर यारो,
ये पागलपन मेरे सर से उतर जाए तो अच्छा हो.

सराबों के तअक्कुब में भटकता फिर रहा है जो,
वो भूला सुबह का अब अपने घर जाए तो अच्छा हो.

-आर. बी. 'राज़'

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

ग़ज़ल: हैरान है दरिया ये मंज़र देख कर


हैरान है दरिया ये मंज़र देख कर,
अपनी तरफ आता समंदर देख कर.

अमनो अमां पर हो रही हैं बैठकें,
बच्चे बहुत खुश हैं कबूतर देख कर.

गुज़रा हुआ इक हादसा याद आ गया,
फिर से उन्हीं हाथों में खंजर देख कर.

अबके बरस बादल भी पछताए बहुत,
सैलाब में डूबे हुए घर देख कर.

पंछी बिना दाना चुगे ही उड़ गए,
आँगन में कुछ टूटे हुए पर देख कर.

दिल को तुम्हारी याद आई यक ब यक,
पहलू में इक शीशे के, पत्थर देख कर.

-आर. बी. राज़

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

ग़ज़ल: दीप खुशियों के जल उठे हर सू


इस वर्ष दीपावली के अवसर पर श्री पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर आयोजित तरही मुशायरे में कही गई मेरी गज़ल पेश-ए-खिदमत है. तरही मिसरा था "दीप खुशियों के जल उठे हर सू". समाअत फरमाएं.

मैंने चाहा था सच दिखे हर सू,
उसने आईने रख दिए हर सू.

ख्वाहिशों को हवस के सहरा में,
धूप के काफिले मिले हर सू.

लोग जल्दी में किसलिए हैं यहाँ,
हडबडाहट सी क्यों दिखे हर सू?

कांच के घर हैं, टूट सकते हैं,
यूं न पत्थर उछालिए हर सू.

फूल भी नफरतों के मौसम में,
खार बन कर बिखर गए हर सू.

लौट आया वो रौशनी बन कर,
"दीप खुशियों के जल उठे हर सू.”

रविवार, 11 सितंबर 2011

ग़ज़ल: कहीं चौखट कहीं छप्पर नहीं है.

कहीं चौखट कहीं छप्पर नहीं है,
यहाँ कोई मुकम्मल घर नहीं है.

सुकूँ से पाँव फैलाऊं तो कैसे,
मेरी इतनी बड़ी चादर नहीं है.

अना के दायरे में जीते रहना,
किसी भी कैद से कमतर नहीं है.

मैं मुद्दत बाद तुमसे मिल रहा हूँ,
खुशी से आँख फिर क्यों तर नहीं है?

नज़र डाली तो है उसने इधर भी,
मगर उसकी नज़र मुझ पर नहीं है!

अजब ये संगसारी है! बज़ाहिर,
किसी के हाथ में पत्थर नहीं है.

-राजीव भरोल 'राज़'

रविवार, 31 जुलाई 2011

ग़ज़ल: मेरा कहा उन्हें अच्छा मगर नहीं लगता

बुलंदियों से हमें यूँ तो डर नहीं लगता
पर आसमां पे बना घर भी घर नहीं लगता.

मैं उनके सामने सच बात कह तो देता हूँ,
मेरा कहा उन्हें अच्छा मगर नहीं लगता.

झुका के सर को अगर उसके दर पे जाते तो,
तुम्हारा इस तरह चौखट से सर नहीं लगता.

फलों से खूब लदा पेड़ है यकीनन वो,
मगर जो छांव दे, ऐसा शजर* नहीं लगता

वो राहे इश्‍क में चल तो पड़ा है, लेकिन वो,
सफर की मुश्किलों से बाखबर नहीं लगता,

हमें तो हर घड़ी पगड़ी की फ़िक्र रहती है,
वगैर इस के ये सर भी तो सर नहीं लगता.

खुदा का शुक्र है अब तक तो मेरे बच्चों पर,
नई हवा का ज़रा भी असर नहीं लगता.

-राजीव भरोल 'राज़'
 * शजर = पेड़
बह्रे मुज्‍तस मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ
मुफायलुन फयलातुन मुफायलुन फैलुन (1212 1122 1212 22)

शनिवार, 25 जून 2011

ग़ज़ल: हमारे ज़ख्म तो भरते दिखाई देते हैं.


जहाँ कहीं हमें दाने दिखाई देते हैं,
वहीँ पे जाल भी फैले दिखाई देते हैं.

मैं कैसे मान लूं बादल यहाँ भी बरसा है,
यहाँ तो सब मुझे प्यासे दिखाई देते हैं.

तुम्हारा दर्द भी तुमसा ही बेवफा निकला,
हमारे ज़ख्म तो भरते दिखाई देते हैं.

कभी तो चाँद को मेरी नज़र से भी देखो,
नहीं दिखेंगे जो धब्बे दिखाई देते हैं.

अगर ये हाथ बढ़ाएं तो आसमां छू लें,
जो कद में आपको छोटे दिखाई देते है.

सियासी भीड़ में उंगली उठाएं किस किस पर,
सब इस हमाम में नंगे दिखाई देते हैं.

मैं सोचता था हवा ने बुझा दिए होंगे,
मेरे चिराग तो जलते दिखाई देते हैं,

बह्रे मुज्‍तस मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ
मुफायलुन फयलातुन मुफायलुन फैलुन (1212 1122 1212 22)

बुधवार, 25 मई 2011

ग़ज़ल: मुहब्बत का कभी इज़हार करना ही नहीं आया.

मुहब्बत का कभी इज़हार करना ही नहीं आया,
मेरी कश्ती को दरिया पार करना ही नहीं आया.


जिसे जो चाहिए था तोड़ कर वो ले गया उनसे,
दरख्तों को कभी इनकार करना ही नहीं आया.


हमारे दोस्तों ने हाथ में खंजर थमाया भी,
मगर दुश्मन पे हमको वार करना ही नहीं आया.


इधर नज़रें मिलीं और तुम उधर दिल हार भी बैठे,
मेरी जाँ तुमको आँखें चार करना ही नहीं आया.


मैं दुनिया ही का हो कर रह गया होता मगर इसको,
मुहब्बत से कभी इसरार करना ही नहीं आया.

-राजीव भरोल 'राज़'

बह्र: हजज मुसम्मन सालिम  (मफ़ाई लुन  X 4)                                      

शनिवार, 7 मई 2011

ग़ज़ल: वो चाहता तो मेरे साथ चल भी सकता था.

तुम्हारी सोच के सांचे में ढल भी सकता था,
वो आदमी ही था इक दिन बदल भी सकता था.

हमारा एक ही रस्ता था एक ही मंजिल,
वो चाहता तो मेरे साथ चल भी सकता था.

ज़मीर की सभी बातें जो मानने लगते,
हमारे हाथ से मौका निकल भी सकता था.

लहू था सर्द वहाँ पर सभी का मुद्दत से,
अगर तुम आंच दिखाते उबल भी सकता था.

चिराग मैंने बुझाये थे अपने हाथों से,
मैं जानता हूँ मेरा हाथ जल भी सकता था.

हर इक सफर में जो चुभता था पाँव में मेरे,
मैं चाहता तो वो काँटा निकल भी सकता था.

उठा के चाँद को थाली में उसकी रख देते,
ज़रा सी बात थी बच्चा बहल भी सकता था.


बह्रे मुज्‍तस मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ
मुफायलुन फयलातुन मुफायलुन फैलुन (1212 1122 1212 22)

मंगलवार, 8 मार्च 2011

ग़ज़ल: ये आंसुओं का ग़लत इस्तेमाल है साहब.


पड़ा हुआ जो ये पानी में जाल है साहब,
यकीन जानिये दरिया की चाल है साहब.

खिलाफ ज़ुल्म के गुस्सा है जो ये लोगों में,
ज़रा सी देर का केवल उबाल है साहब.

हरेक बात पे रो रो के बात मनवाना,
ये आंसुओं का ग़लत इस्तेमाल है साहब.

सुकूने दिल से है दौलत का वैर जग ज़ाहिर,
अमीर है वो मगर ख़स्ताहाल है साहब.

नदी में रह के मगरमछ से वैर रखता है,
उस आदमी की भी हिम्मत कमाल है साहब.

कहाँ कहाँ मेरे हिस्से के ख़्वाब बिखरे हैं,
हमारी नींद का जायज सवाल है साहब.

गरीब के तो हैं सपने भी रोज़मर्रा के,
किराया घर का या रोटी या दाल है साहब.

मैं टूटते हुए घर को बचा नहीं पाया,
अभी तलक मुझे इसका मलाल है साहब.

बह्रे मुज्‍तस मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ
मुफायलुन फयलातुन मुफायलुन फैलुन (1212 1122 1212 22)

सोमवार, 31 जनवरी 2011

ग़ज़ल: किसी सूरत गमे दिल का मदावा हो नहीं सकता.


किसी सूरत ग़मे दिल का मदावा हो नहीं सकता,
समंदर हो चुका हो जो वो दरिया हो नहीं सकता.


हमारे दिल की फितरत भी है कुछ कुछ दोस्तों जैसी,
हमारा होके भी ज़ालिम, हमारा हो नहीं सकता.


रकीबों से गले मिल मिल के करना प्यार की बातें,
महज मुझको जलाना तो इरादा हो नहीं सकता.


मेरे हमदम तेरी बातें भुला देती हैं गम सारे,
मगर बातों से तो घर का गुज़ारा हो नहीं सकता.


हुए हैं किसलिए मोहताज हम सूरज की किरणों के,
अगर सूरज न निकले क्या सवेरा हो नहीं सकता?


ठिकाना ढूंढती है शहर में आवारगी मेरी,
मगर बहती हवा का तो ठिकाना हो नहीं सकता.


वो फूलों, तितलियों की चाप से भी थरथराता है,
कोई हालात का इतना सताया हो नहीं सकता.


बह्र: हजज मुसम्मन सालिम
मफ़ाईलुन X 4 (1222 X 4)

रविवार, 19 दिसंबर 2010

ग़ज़ल: जिसको काँटा नहीं चुभा होगा.

जिसको काँटा नहीं चुभा होगा,
वो कहाँ रात भर जगा होगा.

धुंध बिखरी हुई है आंगन में,
उसने बादल को छू लिया होगा.

दिल की बस्ती में रौशनी कैसी,
वो इसी राह से गया होगा.

जम के बरसा था रात भर बादल,
ज़ख्म कच्चा था खुल गया होगा.

बंद कर के सभी झरोखों को,
मन की खिड़की वो खोलता होगा.

उसकी हर बात है गज़ल जैसी,
घर में खुशबू बिखेरता होगा.

मतलबी इस कदर नहीं था वो,
शहर आदत सी बन गया होगा.

कितने हिस्सों में बट गई खुशबू,
तुम ये कहते थे क्या नया होगा?

बह्र: खफीफ मुसद्दस मख्बून मक्तुअ/मुसद्दस अस्तर
फायलुन फायलुन मफाईलुन (२१२ २१२ १२२२)
 

सोमवार, 22 नवंबर 2010

ग़ज़ल: दुआ करो कि मैं इक दिन फ़कीर हो जाऊं.

मैं चाहता हूँ मैं सचमुच अमीर हो जाऊँ,
दुआ करो कि मैं इक दिन फ़कीर हो जाऊँ.

तेरी हयात में कुछ दख़्ल तो रहे मेरा,
मैं तेरे हाथ की कोई लकीर हो जाऊँ.

तू अपने आपसे मुझको अलग न कर पाए,
जो मेरे बस में हो तेरा ज़मीर हो जाऊँ.

ये जिंदगी के मसाइल भी मेरे हमदम हैं,
मैं तेरी ज़ुल्फ़ का कैसे असीर हो जाऊँ.

ये मुफ़लिसी है जो रखती है राह पर मुझको,
भटक ही जाऊँ, कहीं जो अमीर हो जाऊँ.

हयात = जिंदगी, असीर = कैदी, मसाइल = समस्याएँ, मुफलिसी = गरीबी.
 
बह्र: मुजतस मुसमन मखबून महजूफ
मुफाएलुन-फएलातुन-मुफाएलुन-फएलुन(/फालुन), 1212-1122-1212-22(/112)

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

ग़ज़ल: जो कल तक नोंचता था बाल अब पत्थर दिखाता है

बड़ी शिद्दत से पहले तो वो अपने घर बुलाता है,
मगर एहसान फिर बातों ही बातों में जताता है.

भले ही साथ रहते हैं मगर बातें नहीं होतीं,
मैं घर से सुबह जब निकलूँ वो वापिस घर पे आता है.

ठगा जाता हूँ जब भी तो यही मैं सोच लेता हूँ,
जो दिल का साफ होता है वही धोखा भी खाता है.

भला कैसे बताऊँ अपने दिल का हाल मैं उसको,
मेरी बातों को वो अक्सर हंसी में ही उड़ाता  है.

झगड़ता है जो वो मुझसे तो दुश्मन मत समझ लेना,
बहुत है पास वो दिल के तभी तो दिल दुखाता है.

कहीं दीवानगी उसकी तुम्हारे घर पे ना बरसे,
जो कल तक नोंचता था बाल अब पत्थर दिखाता है.

बह्र: हजज मुसम्मन सालिम (१२२२ १२२२ १२२२ १२२२)

बुधवार, 18 अगस्त 2010

अकेला जान कर मुझको हवा तेवर दिखाती है.


मेरी हिम्मत के पौधे को वो आकर सींच जाती है,
अकेला जान कर मुझको, हवा तेवर दिखाती है.

इनायत उस मेहरबां की हुई रुक रुक के कुछ ऐसे,
घने पेड़ों से छन छन कर सुबह ज्यों धूप आती है.

दिया हाथों में कासा और सीने में दी ख़ुद्दारी,
बता ऐ जिंदगी ऐसे भला क्‍यों आज़माती है.

रहन रख आये आखिर हम उसूलों के सभी गहने,
करें क्‍या भूख आकर रोज़ कुण्‍डी खटखटाती है.

ये पत्थर तोड़ते बच्चे ज़मीं से हैं जुड़े कितने,
पसीने में घुली मिटटी गले इनको लगाती है.

मुझे ही हो गई है तिश्‍नगी से दोस्‍ती वरना,
कोई बदली मेरी छत पर बरसने रोज़ आती है.

जहाँ में माँ की ममता से घनी और छांव क्या होगी,
मुझे पाला, मेरे बच्चों को भी लोरी सुनाती है.


बह्र: हजज मुसम्मन सालिम (१२२२ १२२२ १२२२ १२२२)

बुधवार, 11 अगस्त 2010

क्यों हुआ है शहर ये बीमार उनसे पूछना.



बह्र रमल मुसम्मन महज़ूफ (२१२२ २१२२ २१२२ २१२)


गाँव जब जाओ तो कुछ उपचार उनसे पूछना,
क्यों हुआ है शहर ये बीमार उनसे पूछना.

क्या पता किस धुन मे हाँ कह दें किसी भी बात पर,
मान भी जाएँ अगर,सौ बार उनसे पूछना.

वो जो हर मुश्किल से टकराते रहे हैं उम्र भर,
अपने बेटों से हैं क्यों लाचार उनसे पूछना.

जब सुलझ सकते हों मसले दोस्‍ती से प्‍यार से,
क्यों उठा लेते है वो तलवार उनसे पूछना.

लेखनी मे अब भला वो आग क्यों दिखती नहीं,
बिक गये क्‍या देश के अख़बार उनसे पूछना.

हर तरफ रावण हैं, दुर्योधन, दुशासन, कंस हैं,
कब जनम लेगा कोई अवतार उनसे पूछना.

टूटते हैं क्या कभी रिश्ते सभी कुछ त्याग कर,
जो गये हैं छोड़ कर घरबार उनसे पूछना.

बुधवार, 4 अगस्त 2010

कहाँ तिशनगी के नजारें मिलेंगे


बह्र मुतकारिब मुसम्मन् सालिम (१२२ १२२ १२२ १२२)


कहाँ तिशनगी* के नज़ारे मिलेंगे,
नदी के किनारे किनारे मिलेंगे.

नहीं खाएंगे लाठियां सच की खातिर,
फकत खोखले तुमको नारे मिलेंगे.

समंदर के जैसा हुआ शहर अपना,
यहाँ लोग भी तुमको खारे मिलेंगे.

सफर, मंजिलें सब नए मिल भी जाएँ,
कहाँ हमसफर इतने प्यारे मिलेंगे.

दिलों पर पड़ी गर्द जब भी हटेगी,
यहाँ नाम लिक्खे हमारे मिलेंगे.

ये तिनके ही हैं जो निभाएंगे तुमसे,
इन्हीं के तुम्हें कल सहारे मिलेंगे.

कभी रात छत पर बिता कर तो देखो,
कई टूटते तुमको तारे मिलेंगे.

*तिशनगी = प्यास

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

ग़ज़ल: धड़कनों नें धड़कनों को दिल कि सब बातें बता दीं


 ग़ज़ल: बहरे रमल मुसम्मन सालिम (२१२२ २१२२ २१२२ २१२२)


तुम हो बहती तेज नदिया और मिट्टी का बना मैं,
सोच कर अंजाम अपना दूर तुमसे हूं खड़ा मैं.
बारिशें आईं तो अपने साथ लाईं आंधियां भी,
मांगता था आसमां से बारिशों की क्यों दुआ मैं.
भीग जाओगे अगर मुझको लगाओगे गले तुम,
दर्द की बस्ती से लौटा आंसुओं से हूँ भरा मैं.
आज मुझको फिर पुकारा गांव की अमराइयों ने,
रुक सकूंगा सुन के इसको और कितने दिन भला मैं.
ज़ख्म तो देता है लेकिन प्यार भी करता बहुत है,
अब करूं भी तो करूं क्‍या उस सितमगर का गिला मैं.
इस जहाँ का हर नज़ारा था बहुत दिलकश अभी तक,
अब नहीं भाता मुझे ये रक्स बिलकुल भी चला मैं.
छू के गुजरी रूह को ठंडक दुआओं की हमेशा,
पांव छूने के लिये जब भी बुजुर्गों के झुका मैं.
धड़कनों नें धड़कनों को दिल कि सब बातें बता दीं,
आज बरसों बाद जब फिर मां के सीने से लगा मैं.
 -राजीव भरोल

सोमवार, 21 जून 2010

ग़ज़ल : हाथ में दीपक लिये तुम बन के उजियारा खड़े हो

यह गज़ल, आदरणीय गुरूजी श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद और मार्गदर्शन के कारण ही संभव हो पाई है. 

गज़ल: बह्रे रमल मुसम्मन सालिम (२१२२ २१२२ २१२२ २१२२) 

जिस शजर पर तुम हमेशा फैंकते पत्‍थर रहे हो,
पास में उसके ही मेरा भी मकां है जानते हो. 

सीख कर उड़ना न लौटे वो कभी वापस इधर फिर,
अब हूं सूना घोंसला तो क्‍यों भला ना दुख मुझे हो. 

लड़ रहे हो आँधियों से जिस तरह लड़ते ही रहना,
इस अंधेरी रात में अब तुम ही बस अंतिम दिये हो. 

छांव में बैठेंगे और पत्‍थर भी सब फैंकेगे तुम पर,
पेड़ छायादार हो तुम और फलों से भी लदे हो. 

मैं भला क्‍यों कर डरूं अब राह की दुश्‍वारियों से,
जिंदगी के रास्‍ते में तुम जो अब रहबर मेरे हो. 

है डरा सहमा अंधेरा, वो बढ़े कैसे अब आगे,
हाथ में दीपक लिये तुम बन के उजियारा खड़े हो.

शजर = पेड़

-राजीव भरोल

मंगलवार, 25 मई 2010

कैलिफोर्निया का हास्य कवि सम्मेल्लन और मेरा ब्लॉगर पर पहला पोस्ट.

बहुत दिनों से सोच रहा था की ब्लॉगर पर आ जाऊं. वर्ड प्रेस वाला ब्लॉग लगभग निष्क्रिय है. मेरे मित्र  एवं गुरु भाई वीनस केसरी भी अक्सर पूछते थे की ब्लॉगर पर कब आ रहे हैं. मैं सोचता था की जब कुछ कहने योग्य होगा तो उसी दिन ब्लॉगर पर भी नया ब्लॉग बना लूँगा. टालता रहा.  परन्तु इस टाल मटोल के पीछे  शायद  कोई  दैवीय योजना थी. यह ब्लॉग शुरू होना था श्री राकेश खंडेलवाल जी के कर कमलों द्वारा लिखित एक कविता से जो उन्होंने मेरे परिवार के लिए लिखी.

 (सुनीला: मेरी पत्नी, काशिका: बड़ी बेटी, शिवेन: बेटा, हंसिका: छोटी बेटी)

२२ मई को सनिवेल, कैलिफोर्निया में हास्य कवि सम्मलेन था. राकेश जी भी कविता पाठ करने वाले थे. वीनस जी से बात हुई तो  उन्होंने बताया की श्रीमती निर्मला कपिला जी भी आजकल कैलिफोर्निया आई हुईं हैं. पता चला वे भी सनिवेल के पास ही हैं. फिर क्या था, उनसे फोन पर बात हुई और तय हुआ की सम्मेल्लन में मिलेंगे.  श्रीमती अजित गुप्ता भी संयोगवश कैलिफोर्निया आई हैं और निर्मला जी के पास उनका संपर्क  फोन नंबर था. शाम को कवि सम्मेल्लन में निर्मला जी, अजित जी और उनके परिवार के साथ मिलना हुआ. बहुत अच्छा लगा. निर्मला जी ने, हस्ताक्षर की हुई, अपनी पुस्तक 'प्रेम सेतु' मुझे भेंट की.


कवि सम्मेल्लन के बाद मैं श्री राकेश खंडेलवाल जी एवं श्री कुमार विश्वास जी से मिला. उन्हें जब पता चला की मैं गुरूजी श्री पंकज सुबीर जी का शिष्य हूँ तो वे बहुत प्रसन्न हुए एवं बहुत आत्मीयता से मिले.



 कवि सम्मलेन से अगले दिन श्री राकेश जी ने मेरे घर आना स्वीकार कर लिया. २३ मई, २०१०, मेरे जीवन के बहुत महत्वपूर्ण दिनों में से एक था. लगभग पूरा दिन राकेश जी के साथ बिताया. उनकी रचनाएँ उन्हीं के स्वर में सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. उन्होंने मुझे कविता और ग़ज़ल के बारे में कई अच्छी ज्ञानवर्धक बातें  बताईं.  मुझे हस्ताक्षर की हुई अपनी पुस्तक "अँधेरी रात का सूरज" भी भेंट की. 

 (राकेश जी, मेरे और मेरे परिवार के साथ)


राकेश जी की हास्य रचना जो उन्होंने सम्मेल्लन में भी पढ़ी और बहुत दाद पायी: