रविवार, 19 दिसंबर 2010

ग़ज़ल: जिसको काँटा नहीं चुभा होगा.

जिसको काँटा नहीं चुभा होगा,
वो कहाँ रात भर जगा होगा.

धुंध बिखरी हुई है आंगन में,
उसने बादल को छू लिया होगा.

दिल की बस्ती में रौशनी कैसी,
वो इसी राह से गया होगा.

जम के बरसा था रात भर बादल,
ज़ख्म कच्चा था खुल गया होगा.

बंद कर के सभी झरोखों को,
मन की खिड़की वो खोलता होगा.

उसकी हर बात है गज़ल जैसी,
घर में खुशबू बिखेरता होगा.

मतलबी इस कदर नहीं था वो,
शहर आदत सी बन गया होगा.

कितने हिस्सों में बट गई खुशबू,
तुम ये कहते थे क्या नया होगा?

बह्र: खफीफ मुसद्दस मख्बून मक्तुअ/मुसद्दस अस्तर
फायलुन फायलुन मफाईलुन (२१२ २१२ १२२२)
 

सोमवार, 22 नवंबर 2010

ग़ज़ल: दुआ करो कि मैं इक दिन फ़कीर हो जाऊं.

मैं चाहता हूँ मैं सचमुच अमीर हो जाऊँ,
दुआ करो कि मैं इक दिन फ़कीर हो जाऊँ.

तेरी हयात में कुछ दख़्ल तो रहे मेरा,
मैं तेरे हाथ की कोई लकीर हो जाऊँ.

तू अपने आपसे मुझको अलग न कर पाए,
जो मेरे बस में हो तेरा ज़मीर हो जाऊँ.

ये जिंदगी के मसाइल भी मेरे हमदम हैं,
मैं तेरी ज़ुल्फ़ का कैसे असीर हो जाऊँ.

ये मुफ़लिसी है जो रखती है राह पर मुझको,
भटक ही जाऊँ, कहीं जो अमीर हो जाऊँ.

हयात = जिंदगी, असीर = कैदी, मसाइल = समस्याएँ, मुफलिसी = गरीबी.
 
बह्र: मुजतस मुसमन मखबून महजूफ
मुफाएलुन-फएलातुन-मुफाएलुन-फएलुन(/फालुन), 1212-1122-1212-22(/112)

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

ग़ज़ल: जो कल तक नोंचता था बाल अब पत्थर दिखाता है

बड़ी शिद्दत से पहले तो वो अपने घर बुलाता है,
मगर एहसान फिर बातों ही बातों में जताता है.

भले ही साथ रहते हैं मगर बातें नहीं होतीं,
मैं घर से सुबह जब निकलूँ वो वापिस घर पे आता है.

ठगा जाता हूँ जब भी तो यही मैं सोच लेता हूँ,
जो दिल का साफ होता है वही धोखा भी खाता है.

भला कैसे बताऊँ अपने दिल का हाल मैं उसको,
मेरी बातों को वो अक्सर हंसी में ही उड़ाता  है.

झगड़ता है जो वो मुझसे तो दुश्मन मत समझ लेना,
बहुत है पास वो दिल के तभी तो दिल दुखाता है.

कहीं दीवानगी उसकी तुम्हारे घर पे ना बरसे,
जो कल तक नोंचता था बाल अब पत्थर दिखाता है.

बह्र: हजज मुसम्मन सालिम (१२२२ १२२२ १२२२ १२२२)

बुधवार, 18 अगस्त 2010

अकेला जान कर मुझको हवा तेवर दिखाती है.


मेरी हिम्मत के पौधे को वो आकर सींच जाती है,
अकेला जान कर मुझको, हवा तेवर दिखाती है.

इनायत उस मेहरबां की हुई रुक रुक के कुछ ऐसे,
घने पेड़ों से छन छन कर सुबह ज्यों धूप आती है.

दिया हाथों में कासा और सीने में दी ख़ुद्दारी,
बता ऐ जिंदगी ऐसे भला क्‍यों आज़माती है.

रहन रख आये आखिर हम उसूलों के सभी गहने,
करें क्‍या भूख आकर रोज़ कुण्‍डी खटखटाती है.

ये पत्थर तोड़ते बच्चे ज़मीं से हैं जुड़े कितने,
पसीने में घुली मिटटी गले इनको लगाती है.

मुझे ही हो गई है तिश्‍नगी से दोस्‍ती वरना,
कोई बदली मेरी छत पर बरसने रोज़ आती है.

जहाँ में माँ की ममता से घनी और छांव क्या होगी,
मुझे पाला, मेरे बच्चों को भी लोरी सुनाती है.


बह्र: हजज मुसम्मन सालिम (१२२२ १२२२ १२२२ १२२२)

बुधवार, 11 अगस्त 2010

क्यों हुआ है शहर ये बीमार उनसे पूछना.



बह्र रमल मुसम्मन महज़ूफ (२१२२ २१२२ २१२२ २१२)


गाँव जब जाओ तो कुछ उपचार उनसे पूछना,
क्यों हुआ है शहर ये बीमार उनसे पूछना.

क्या पता किस धुन मे हाँ कह दें किसी भी बात पर,
मान भी जाएँ अगर,सौ बार उनसे पूछना.

वो जो हर मुश्किल से टकराते रहे हैं उम्र भर,
अपने बेटों से हैं क्यों लाचार उनसे पूछना.

जब सुलझ सकते हों मसले दोस्‍ती से प्‍यार से,
क्यों उठा लेते है वो तलवार उनसे पूछना.

लेखनी मे अब भला वो आग क्यों दिखती नहीं,
बिक गये क्‍या देश के अख़बार उनसे पूछना.

हर तरफ रावण हैं, दुर्योधन, दुशासन, कंस हैं,
कब जनम लेगा कोई अवतार उनसे पूछना.

टूटते हैं क्या कभी रिश्ते सभी कुछ त्याग कर,
जो गये हैं छोड़ कर घरबार उनसे पूछना.

बुधवार, 4 अगस्त 2010

कहाँ तिशनगी के नजारें मिलेंगे


बह्र मुतकारिब मुसम्मन् सालिम (१२२ १२२ १२२ १२२)


कहाँ तिशनगी* के नज़ारे मिलेंगे,
नदी के किनारे किनारे मिलेंगे.

नहीं खाएंगे लाठियां सच की खातिर,
फकत खोखले तुमको नारे मिलेंगे.

समंदर के जैसा हुआ शहर अपना,
यहाँ लोग भी तुमको खारे मिलेंगे.

सफर, मंजिलें सब नए मिल भी जाएँ,
कहाँ हमसफर इतने प्यारे मिलेंगे.

दिलों पर पड़ी गर्द जब भी हटेगी,
यहाँ नाम लिक्खे हमारे मिलेंगे.

ये तिनके ही हैं जो निभाएंगे तुमसे,
इन्हीं के तुम्हें कल सहारे मिलेंगे.

कभी रात छत पर बिता कर तो देखो,
कई टूटते तुमको तारे मिलेंगे.

*तिशनगी = प्यास

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

ग़ज़ल: धड़कनों नें धड़कनों को दिल कि सब बातें बता दीं


 ग़ज़ल: बहरे रमल मुसम्मन सालिम (२१२२ २१२२ २१२२ २१२२)


तुम हो बहती तेज नदिया और मिट्टी का बना मैं,
सोच कर अंजाम अपना दूर तुमसे हूं खड़ा मैं.
बारिशें आईं तो अपने साथ लाईं आंधियां भी,
मांगता था आसमां से बारिशों की क्यों दुआ मैं.
भीग जाओगे अगर मुझको लगाओगे गले तुम,
दर्द की बस्ती से लौटा आंसुओं से हूँ भरा मैं.
आज मुझको फिर पुकारा गांव की अमराइयों ने,
रुक सकूंगा सुन के इसको और कितने दिन भला मैं.
ज़ख्म तो देता है लेकिन प्यार भी करता बहुत है,
अब करूं भी तो करूं क्‍या उस सितमगर का गिला मैं.
इस जहाँ का हर नज़ारा था बहुत दिलकश अभी तक,
अब नहीं भाता मुझे ये रक्स बिलकुल भी चला मैं.
छू के गुजरी रूह को ठंडक दुआओं की हमेशा,
पांव छूने के लिये जब भी बुजुर्गों के झुका मैं.
धड़कनों नें धड़कनों को दिल कि सब बातें बता दीं,
आज बरसों बाद जब फिर मां के सीने से लगा मैं.
 -राजीव भरोल

सोमवार, 21 जून 2010

ग़ज़ल : हाथ में दीपक लिये तुम बन के उजियारा खड़े हो

यह गज़ल, आदरणीय गुरूजी श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद और मार्गदर्शन के कारण ही संभव हो पाई है. 

गज़ल: बह्रे रमल मुसम्मन सालिम (२१२२ २१२२ २१२२ २१२२) 

जिस शजर पर तुम हमेशा फैंकते पत्‍थर रहे हो,
पास में उसके ही मेरा भी मकां है जानते हो. 

सीख कर उड़ना न लौटे वो कभी वापस इधर फिर,
अब हूं सूना घोंसला तो क्‍यों भला ना दुख मुझे हो. 

लड़ रहे हो आँधियों से जिस तरह लड़ते ही रहना,
इस अंधेरी रात में अब तुम ही बस अंतिम दिये हो. 

छांव में बैठेंगे और पत्‍थर भी सब फैंकेगे तुम पर,
पेड़ छायादार हो तुम और फलों से भी लदे हो. 

मैं भला क्‍यों कर डरूं अब राह की दुश्‍वारियों से,
जिंदगी के रास्‍ते में तुम जो अब रहबर मेरे हो. 

है डरा सहमा अंधेरा, वो बढ़े कैसे अब आगे,
हाथ में दीपक लिये तुम बन के उजियारा खड़े हो.

शजर = पेड़

-राजीव भरोल

मंगलवार, 25 मई 2010

कैलिफोर्निया का हास्य कवि सम्मेल्लन और मेरा ब्लॉगर पर पहला पोस्ट.

बहुत दिनों से सोच रहा था की ब्लॉगर पर आ जाऊं. वर्ड प्रेस वाला ब्लॉग लगभग निष्क्रिय है. मेरे मित्र  एवं गुरु भाई वीनस केसरी भी अक्सर पूछते थे की ब्लॉगर पर कब आ रहे हैं. मैं सोचता था की जब कुछ कहने योग्य होगा तो उसी दिन ब्लॉगर पर भी नया ब्लॉग बना लूँगा. टालता रहा.  परन्तु इस टाल मटोल के पीछे  शायद  कोई  दैवीय योजना थी. यह ब्लॉग शुरू होना था श्री राकेश खंडेलवाल जी के कर कमलों द्वारा लिखित एक कविता से जो उन्होंने मेरे परिवार के लिए लिखी.

 (सुनीला: मेरी पत्नी, काशिका: बड़ी बेटी, शिवेन: बेटा, हंसिका: छोटी बेटी)

२२ मई को सनिवेल, कैलिफोर्निया में हास्य कवि सम्मलेन था. राकेश जी भी कविता पाठ करने वाले थे. वीनस जी से बात हुई तो  उन्होंने बताया की श्रीमती निर्मला कपिला जी भी आजकल कैलिफोर्निया आई हुईं हैं. पता चला वे भी सनिवेल के पास ही हैं. फिर क्या था, उनसे फोन पर बात हुई और तय हुआ की सम्मेल्लन में मिलेंगे.  श्रीमती अजित गुप्ता भी संयोगवश कैलिफोर्निया आई हैं और निर्मला जी के पास उनका संपर्क  फोन नंबर था. शाम को कवि सम्मेल्लन में निर्मला जी, अजित जी और उनके परिवार के साथ मिलना हुआ. बहुत अच्छा लगा. निर्मला जी ने, हस्ताक्षर की हुई, अपनी पुस्तक 'प्रेम सेतु' मुझे भेंट की.


कवि सम्मेल्लन के बाद मैं श्री राकेश खंडेलवाल जी एवं श्री कुमार विश्वास जी से मिला. उन्हें जब पता चला की मैं गुरूजी श्री पंकज सुबीर जी का शिष्य हूँ तो वे बहुत प्रसन्न हुए एवं बहुत आत्मीयता से मिले.



 कवि सम्मलेन से अगले दिन श्री राकेश जी ने मेरे घर आना स्वीकार कर लिया. २३ मई, २०१०, मेरे जीवन के बहुत महत्वपूर्ण दिनों में से एक था. लगभग पूरा दिन राकेश जी के साथ बिताया. उनकी रचनाएँ उन्हीं के स्वर में सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. उन्होंने मुझे कविता और ग़ज़ल के बारे में कई अच्छी ज्ञानवर्धक बातें  बताईं.  मुझे हस्ताक्षर की हुई अपनी पुस्तक "अँधेरी रात का सूरज" भी भेंट की. 

 (राकेश जी, मेरे और मेरे परिवार के साथ)


राकेश जी की हास्य रचना जो उन्होंने सम्मेल्लन में भी पढ़ी और बहुत दाद पायी: