सोमवार, 21 जून 2010

ग़ज़ल : हाथ में दीपक लिये तुम बन के उजियारा खड़े हो

यह गज़ल, आदरणीय गुरूजी श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद और मार्गदर्शन के कारण ही संभव हो पाई है. 

गज़ल: बह्रे रमल मुसम्मन सालिम (२१२२ २१२२ २१२२ २१२२) 

जिस शजर पर तुम हमेशा फैंकते पत्‍थर रहे हो,
पास में उसके ही मेरा भी मकां है जानते हो. 

सीख कर उड़ना न लौटे वो कभी वापस इधर फिर,
अब हूं सूना घोंसला तो क्‍यों भला ना दुख मुझे हो. 

लड़ रहे हो आँधियों से जिस तरह लड़ते ही रहना,
इस अंधेरी रात में अब तुम ही बस अंतिम दिये हो. 

छांव में बैठेंगे और पत्‍थर भी सब फैंकेगे तुम पर,
पेड़ छायादार हो तुम और फलों से भी लदे हो. 

मैं भला क्‍यों कर डरूं अब राह की दुश्‍वारियों से,
जिंदगी के रास्‍ते में तुम जो अब रहबर मेरे हो. 

है डरा सहमा अंधेरा, वो बढ़े कैसे अब आगे,
हाथ में दीपक लिये तुम बन के उजियारा खड़े हो.

शजर = पेड़

-राजीव भरोल