सोमवार, 21 जून 2010

ग़ज़ल : हाथ में दीपक लिये तुम बन के उजियारा खड़े हो

यह गज़ल, आदरणीय गुरूजी श्री पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद और मार्गदर्शन के कारण ही संभव हो पाई है. 

गज़ल: बह्रे रमल मुसम्मन सालिम (२१२२ २१२२ २१२२ २१२२) 

जिस शजर पर तुम हमेशा फैंकते पत्‍थर रहे हो,
पास में उसके ही मेरा भी मकां है जानते हो. 

सीख कर उड़ना न लौटे वो कभी वापस इधर फिर,
अब हूं सूना घोंसला तो क्‍यों भला ना दुख मुझे हो. 

लड़ रहे हो आँधियों से जिस तरह लड़ते ही रहना,
इस अंधेरी रात में अब तुम ही बस अंतिम दिये हो. 

छांव में बैठेंगे और पत्‍थर भी सब फैंकेगे तुम पर,
पेड़ छायादार हो तुम और फलों से भी लदे हो. 

मैं भला क्‍यों कर डरूं अब राह की दुश्‍वारियों से,
जिंदगी के रास्‍ते में तुम जो अब रहबर मेरे हो. 

है डरा सहमा अंधेरा, वो बढ़े कैसे अब आगे,
हाथ में दीपक लिये तुम बन के उजियारा खड़े हो.

शजर = पेड़

-राजीव भरोल

10 टिप्‍पणियां:

  1. छांव में बैठेंगे और पत्‍थर भी सब फैंकेगे तुम पर,
    पेड़ छायादार हो तुम और फलों से भी लदे हो.

    राजीव जी सुन्दर भाव समेटे हैं आपने, और इस शेर की तो जितनी तारीफ़ की जाए कम है

    बहुत बधाई

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  2. छांव में बैठेंगे और पत्‍थर भी सब फैंकेगे तुम पर,
    पेड़ छायादार हो तुम और फलों से भी लदे हो.

    -गज़ब! बहुत खूब कहा!!

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  3. एक एक छन्द में जीवन के कटु सत्यों को खींच कर रख दिया है ।

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  4. सीख कर उड़ना न लौटे वो कभी वापस इधर फिर,
    अब हूं सूना घोंसला तो क्‍यों भला ना दुख मुझे हो.

    वाह राजीव जी बहुत ही सुन्दर गज़ल है।क्यों ना हो भाई सुबीर के हाथ जो लगे हैं। तो छुट्टियाँ गज़ल लिख कर मना रहे हो। नंगल कब आ रहे हैं।।।।।।।। शुभकामनायें

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  5. बेहतरीन शेर कहे हैं भाई ... बहुत ख़ूब !!

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  6. राजीव भरोलजी
    पहली बार पढ़ा है आपको …
    अच्छा कलाम कह लेते हैं , बधाई !
    शानदार मत्ला है…
    जिस शजर पर तुम हमेशा फैंकते पत्‍थर रहे हो,
    पास में उसके ही मेरा भी मकां है जानते हो

    … और जैसे इस शे'र में जवाब भी दे दिया है …
    छांव में बैठेंगे और पत्‍थर भी सब फैंकेगे तुम पर,
    पेड़ छायादार हो तुम और फलों से भी लदे हो


    समय मिले तो शस्वरं पर भी आने का आमंत्रण है ।

    - राजेन्द्र स्वर्णकार
    शस्वरं

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  7. है डरा सहमा अंधेरा, वो बढ़े कैसे अब आगे,
    हाथ में दीपक लिये तुम बन के उजियारा खड़े हो.
    ab to andhera thahar nahi sakta
    blog par aane ke liye aapka shukriya
    kayamat tak ye saath rahe khuda se itni dua hai

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  8. सीख कर उड़ना न लौटे वो कभी वापस इधर फिर,
    अब हूं सूना घोंसला तो क्‍यों भला ना दुख मुझे हो.

    वाह...क्या शेर कहा है राजीव जी वाह...पूरी ग़ज़ल खूब कही है आपने...आप तो हमारे गुरु भाई हो गुरुदेव पंकज जी से ही हमने भी कुछ कहना सीखा है...अब तक का लिखा सब उनकी ही शिक्षा का नतीजा है...आपके शजर वाले शेर को पढ़ कर मुझे अपनी ग़ज़ल का एक शेर याद आ गया...

    जिस शजर ने डालियों पर देखिये फल भर दिए
    उसको चुनचुन कर के लोगों ने बहुत पत्थर दिए

    नीरज

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  9. छांव में बैठेंगे और पत्‍थर भी सब फैंकेगे तुम पर,
    पेड़ छायादार हो तुम और फलों से भी लदे हो.
    bhut hee sundar man ko chhoo lene wala....

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