गुरुवार, 1 जुलाई 2010

ग़ज़ल: धड़कनों नें धड़कनों को दिल कि सब बातें बता दीं


 ग़ज़ल: बहरे रमल मुसम्मन सालिम (२१२२ २१२२ २१२२ २१२२)


तुम हो बहती तेज नदिया और मिट्टी का बना मैं,
सोच कर अंजाम अपना दूर तुमसे हूं खड़ा मैं.
बारिशें आईं तो अपने साथ लाईं आंधियां भी,
मांगता था आसमां से बारिशों की क्यों दुआ मैं.
भीग जाओगे अगर मुझको लगाओगे गले तुम,
दर्द की बस्ती से लौटा आंसुओं से हूँ भरा मैं.
आज मुझको फिर पुकारा गांव की अमराइयों ने,
रुक सकूंगा सुन के इसको और कितने दिन भला मैं.
ज़ख्म तो देता है लेकिन प्यार भी करता बहुत है,
अब करूं भी तो करूं क्‍या उस सितमगर का गिला मैं.
इस जहाँ का हर नज़ारा था बहुत दिलकश अभी तक,
अब नहीं भाता मुझे ये रक्स बिलकुल भी चला मैं.
छू के गुजरी रूह को ठंडक दुआओं की हमेशा,
पांव छूने के लिये जब भी बुजुर्गों के झुका मैं.
धड़कनों नें धड़कनों को दिल कि सब बातें बता दीं,
आज बरसों बाद जब फिर मां के सीने से लगा मैं.
 -राजीव भरोल

14 टिप्‍पणियां:

  1. आज मुझको फिर पुकारा गांव की अमराइयों ने,
    रुक सकूंगा सुन के इसको और कितने दिन भला मैं.

    -वाह! बहुत खूब!

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  2. बहुत खूबसूरत...!
    "भीग जाओगे अगर मुझको लगाओगे गले तुम
    दर्द की बस्ती से लौटा आंसूओं से हूं भरा मैं"
    बेहद शानदार।
    आभार।

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  3. कोई शब्द नहीं हैं टिप्पणी के लिये । बस आप लिखते रहें, हम पढ़ते रहें ।

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  4. छू के गुजरी रूह को ठंडक दुआओं की हमेशा,
    पांव छूने के लिये जब भी बुजुर्गों के झुका मैं.
    धड़कनों नें धड़कनों को दिल कि सब बातें बता दीं,
    आज बरसों बाद जब फिर मां के सीने से लगा मैं.

    बहुत उम्दा अश’आर हैं ,ऐसे अश’आर जिन्हें महसूस किया जा सकता है
    बहुत ख़ूब!

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  5. आज मुझको फिर पुकारा गांव की अमराइयों ने,
    रुक सकूंगा सुन के इसको और कितने दिन भला मैं....

    मिट्टी की खुश्बू से लिपटे शेर हैं सब ..... बहुत लाजवाब ग़ज़ल है ...

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  6. राजीव भाई नमस्कार,

    तुसी तो छा गए हो

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  7. धड़कनों नें धड़कनों को दिल कि सब बातें बता दीं,
    आज बरसों बाद जब फिर मां के सीने से लगा मैं.
    आज मुझको फिर पुकारा गांव की अमराइयों ने,
    रुक सकूंगा सुन के इसको और कितने दिन भला मैं.
    वाह राजीव जी बहुत सुन्दर गज़ल है। मै तो आपका नंगल मे इन्तज़ार कर रही हूँ। आपने बताया नही कि कब आ रहे हैं। बीवी बच्चों को भी साथ ले कर आयें। शुभकामनायें। हाँ छुट्टी कब तक है?

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  8. छू के गुजरी रूह को ठंडक दुआओं की हमेशा,
    पांव छूने के लिये जब भी बुजुर्गों के झुका मैं.

    वाह राजीव जी वाह...क्या कमाल का शेर कहा है आपने...दिल छू गया...इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए ढेरों दाद कबूल करें...
    नीरज

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  9. छू के गुजरी रूह को ठंडक दुआओं की हमेशा,
    पांव छूने के लिये जब भी बुजुर्गों के झुका मैं.

    आज मुझको फिर पुकारा गांव की अमराइयों ने,
    रुक सकूंगा सुन के इसको और कितने दिन भला मैं.

    इन दो शेरों ने मन को बहुत सुकून बख्शा है .....
    ज़िंदगी के नज़रिए से वाक़िफ करवाती हुई ग़ज़ल
    बहुत शानदार ......
    मुबारकबाद

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  10. शायद पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ और अफ़सोस में हूँ कि इतनी देर से क्यों आया. आपके बारे में श्री वीनस केशरी जी ने काफी कुछ बताया था, कुछ अरसा पहले लेकिन व्यस्तताओं ने दिमाग से सब कुछ निकाल दिया. आज एक ब्लॉग पर आप द्वारा दिया गया कमेन्ट देखा तो याद आ गए आप.
    गजलें बहुत अच्छी लिख रहे हैं आप और इनके लिए किया गया आपका परिश्रम नजर आ रहा है.
    मैं अलग से कोई शेर कोट करने का आदी नहीं हूँ इस लिए समग्र रचना पर अपने विचार दे रहा हूँ.
    मेहनत जारी रखिए और इस बात के लिए मेरी बधाई स्वीकार कीजिए कि अमेरिका में रहते हुए भी, युवा होने के बावजूद, आप मातृभाषा की सेवा कर रहे हैं.

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  11. बहुत ही सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने लाजवाब ग़ज़ल लिखा है! उम्दा प्रस्तुती!

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  12. आज मुझको फिर पुकारा गांव की अमराइयों ने,
    रुक सकूंगा सुन के इसको और कितने दिन भला मैं.

    waah kya sher kaha hai . bahut khoobsurat

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  13. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  14. धड़कनों नें धड़कनों को दिल कि सब बातें बता दीं,
    आज बरसों बाद जब फिर मां के सीने से लगा मैं.

    बहुत ही उम्दा काव्य है

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