बुधवार, 11 अगस्त 2010

क्यों हुआ है शहर ये बीमार उनसे पूछना.



बह्र रमल मुसम्मन महज़ूफ (२१२२ २१२२ २१२२ २१२)


गाँव जब जाओ तो कुछ उपचार उनसे पूछना,
क्यों हुआ है शहर ये बीमार उनसे पूछना.

क्या पता किस धुन मे हाँ कह दें किसी भी बात पर,
मान भी जाएँ अगर,सौ बार उनसे पूछना.

वो जो हर मुश्किल से टकराते रहे हैं उम्र भर,
अपने बेटों से हैं क्यों लाचार उनसे पूछना.

जब सुलझ सकते हों मसले दोस्‍ती से प्‍यार से,
क्यों उठा लेते है वो तलवार उनसे पूछना.

लेखनी मे अब भला वो आग क्यों दिखती नहीं,
बिक गये क्‍या देश के अख़बार उनसे पूछना.

हर तरफ रावण हैं, दुर्योधन, दुशासन, कंस हैं,
कब जनम लेगा कोई अवतार उनसे पूछना.

टूटते हैं क्या कभी रिश्ते सभी कुछ त्याग कर,
जो गये हैं छोड़ कर घरबार उनसे पूछना.

18 टिप्‍पणियां:

  1. Rajeev ji

    matle par hi man jhoom gaya
    phir ye sher to ufff
    क्या पता किस धुन मे हाँ कह दें किसी भी बात पर,
    मान भी जाएँ अगर,सौ बार उनसे पूछना.

    waah

    jo gaye chor kar gharbaar ..... waah kamaal ka sher hai

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  2. हर तरफ रावण हैं, दुर्योधन, दुशासन, कंस हैं,
    कब जनम लेगा कोई अवतार उनसे पूछना.


    वाह वा...शाश्वत प्रश्न पूछती आपकी ये ग़ज़ल लाजवाब है....हर शेर अपनी कहानी कह रहा है...इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए मेरी दिली दाद कबूल करें...
    नीरज

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  3. राजीव जी, क्या खूबसूरत गज़ल कही है, दिल खुश हो गया

    हर एक शेर लाजवाब

    और आपकी अब तक की गज़लो मे से मुझे यह गज़ल सबसे ज्यादा पसन्द है

    दिली दाद कबूल करें

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  4. लेखनी मे अब भला वो आग क्यों दिखती नहीं,
    बिक गये क्‍या देश के अख़बार उनसे पूछना.

    किकनी गहरी बात कही है। दमदार अन्दाज़।

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  5. जब सुलझ सकते हों मसले दोस्‍ती से प्‍यार से,
    क्यों उठा लेते है वो तलवार उनसे पूछना.
    BHUT HEE ACHCHHI LINE JO BHUT KUCHH SOCHNE KO MAJBOOR KAR DE...WAH..

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  6. स्‍वतंत्रता दिवस पर हार्दिक बधाई।
    जब सुलझ सकते हों मसले दोस्‍ती से प्‍यार से,
    क्यों उठा लेते है वो तलवार उनसे पूछना.

    वो जो हर मुश्किल से टकराते रहे हैं उम्र भर,
    अपने बेटों से हैं क्यों लाचार उनसे पूछना.

    टूटते हैं क्या कभी रिश्ते सभी कुछ त्याग कर,
    जो गये हैं छोड़ कर घरबार उनसे पूछना.

    वाह क्या शेर कहे हैं। टूटते वाले शेर मे एक प्रवासी का दर्द झलक रहा है। बधाई इस गज़ल के लिये।

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  7. लेखनी मे अब भला वो आग क्यों दिखती नहीं,
    बिक गये क्‍या देश के अख़बार उनसे पूछना.



    abhi bahut kuchh puchna baaki hai...

    vo yaad aata hai ki...."akhbaaron ko padhne ke aadi ho gaye hain log, warna chehron par kya kuchh nahi likha hota..."


    kaash har sawaal ka jawaab mil pata........

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  8. आपको भी स्वतंत्रता दिवस की बहुत बहुत बधाई
    आपकी रचनाएँ बहुत ही सुन्दर है

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  9. मुझे याद नहीं, आपके ब्लॉग पर पहले कभी आया भी था या नहीं लेकिन इतना जरूर इल्म है कि हम शायद एक दुसरे से बखूबी वाकिफ हैं. आपकी यह गजल, मेरे पास शायद प्रशंसा के लिए उचित शब्द नहीं, फिर भी यह जरूर कहूँगा कि अच्छे अच्छे रचनाकारों के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकती है. आपने जिस तरह सवालिया अंदाज़ में शेर कहे हैं, वो बेहद मुश्किल हैं, बहुतों के लिए, सम्भवतः मेरे लिए भी.

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  10. भाई वाह!
    वाह-वा!
    अब तक क्यों नहीं आया यहाँ? पता नहीं…
    बहुत उम्दा - बहुत बढ़िया।

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  11. वो जो हर मुश्किल से टकराते रहे हैं उम्र भर,
    अपने बेटों से हैं क्यों लाचार उनसे पूछना....

    Vaah .. subhaan alla ... jaan le li is sher ne ... insaan sach mein apni aulaad se majboor ho jaata hai ...

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  12. ek bar fir saare sher dil tak utre... matla hi itna shaandar hai ki baki ghazal khud ba khud aankhn ko pakad leti hai ..... aap ki lekhni takneekee drishti se mazboot hui hai ....

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  13. आप की जो ग़ज़लें छूट गई हैं एक एक कर के पढ़ रही हूं ,बहुत अच्छा लिखते हैं आप

    जब सुलझ सकते हों मसले दोस्‍ती से प्‍यार से,
    क्यों उठा लेते है वो तलवार उनसे पूछना.

    लेखनी मे अब भला वो आग क्यों दिखती नहीं,
    बिक गये क्‍या देश के अख़बार उनसे पूछना.

    बहुत ख़ूब!

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