बुधवार, 18 अगस्त 2010

अकेला जान कर मुझको हवा तेवर दिखाती है.


मेरी हिम्मत के पौधे को वो आकर सींच जाती है,
अकेला जान कर मुझको, हवा तेवर दिखाती है.

इनायत उस मेहरबां की हुई रुक रुक के कुछ ऐसे,
घने पेड़ों से छन छन कर सुबह ज्यों धूप आती है.

दिया हाथों में कासा और सीने में दी ख़ुद्दारी,
बता ऐ जिंदगी ऐसे भला क्‍यों आज़माती है.

रहन रख आये आखिर हम उसूलों के सभी गहने,
करें क्‍या भूख आकर रोज़ कुण्‍डी खटखटाती है.

ये पत्थर तोड़ते बच्चे ज़मीं से हैं जुड़े कितने,
पसीने में घुली मिटटी गले इनको लगाती है.

मुझे ही हो गई है तिश्‍नगी से दोस्‍ती वरना,
कोई बदली मेरी छत पर बरसने रोज़ आती है.

जहाँ में माँ की ममता से घनी और छांव क्या होगी,
मुझे पाला, मेरे बच्चों को भी लोरी सुनाती है.


बह्र: हजज मुसम्मन सालिम (१२२२ १२२२ १२२२ १२२२)

30 टिप्‍पणियां:

  1. मेरी हिम्मत के पौधे को वो आकर सींच जाती है,
    अकेला जान कर मुझको, हवा तेवर दिखाती है.
    .....Bahut sahi kaha aapne Hawa bhi taakat ka aajmati hai... bus himmat se yadi kaam nahi liya to bahar ka rashta dikhane mein der kahan lagti hai..
    जहाँ में माँ की ममता से घनी और छांव क्या होगी,
    मुझे पाला, मेरे बच्चों को भी लोरी सुनाती है.
    Maa se badhkar koi nahi..
    Bahut achhi lagi aapki gajal..
    haardik shubhkamnayne
    ....

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  2. जहाँ में माँ की ममता से घनी और छांव क्या होगी,
    मुझे पाला, मेरे बच्चों को भी लोरी सुनाती है.
    bahut hee komal ehsash

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  3. ये पत्थर तोड़ते बच्चे ज़मीं से हैं जुड़े कितने,
    पसीने में घुली मिटटी गले इनको लगाती है.
    खुबसूरत शेर दिल की गहराई से लिखा गया, मुवारक हो

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  4. जहाँ में माँ की ममता से घनी और छांव क्या होगी,
    मुझे पाला, मेरे बच्चों को भी लोरी सुनाती है...

    Itni lajawaab gazal aur ye sher to gazab hai ... har sher mein samvedansheelta jinda hai ...

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  5. रहन रख आये आखिर हम उसूलों के सभी गहने,
    करें क्‍या भूख आकर रोज़ कुण्‍डी खटखटाती है.
    Bahut badiya likha hai.
    App likte rahe aur hum padte rahe.

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  9. गुरू जी की ब्लॉग लिस्ट में मतले की झलक इधर ले के आई और हर एक शेर को मुकम्मल और एक दूसरे से बेहतरीन पाया।

    पूरी पूरी गज़ल ही उम्दा...! बधाई स्वीकारें...

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  10. टिप्पणियों की फालतू संख्या बढ़ाने हेतु क्षमा :)

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  11. वाह राजीव जी,
    दिलकश गज़ल

    हर शेर पसन्द आया

    दिया हाथों में कासा और सीने में दी ख़ुद्दारी,
    बता ऐ जिंदगी ऐसे भला क्योंे आज़माती है.

    जहाँ में माँ की ममता से घनी और छांव क्या होगी,
    मुझे पाला, मेरे बच्चों को भी लोरी सुनाती है.

    राजीव भाई, ये दो शेर चुनने मे मुझे बहुत मेहनत करनी पडी

    मगर इनके बाद इसमे से एक को चुनना मेरे लिये सम्भव नहीं है इसलिये मेरे लिये दोनो हासिले गज़ल शेर है

    गुरु जी से बात हो रही थी तो गुरु जी ने आपकी गज़ल की बहुत तारीफ़ की
    इतने कम समय मे इस मुकाम पर पहुचना बहुत बडी बात है

    एक बार फ़िर से बधाई कबूल करें

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  12. रक्षाबंधन के पावन पर्व पर आपको हार्दिक बधाई !!

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  13. matle se lekar aakhiri sher tak har sher me badi bareeki se apne baaten kahi hain ..shaandar lagi yah ghazal rajeev ji waah

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  14. सबसे पहले तो यही कहूंगा... हुजुर मुझे आते आते देर हो गयी. (खैर इसमें कुसूर मेरा भी नहीं है :)

    आपकी गज़लें बहुत पसंद आई. मैं तो भाव रस में खो गया. अभी और पढना बाकी है.

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  15. बहुत अच्छी और अनुभवजन्य रचना है। कई बातें सार्वकालिक महत्व की हैं।

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  16. दिया हाथों में कासा और सीने में दी ख़ुद्दारी,
    बता ऐ ज़िन्दगी ऐसे भला क्यूं आज़माती है।
    बेहतरीन शे'र ख़ूबसूरत ग़ज़ल।

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  17. राजीव, तुम्‍हें आज मेरे ब्‍लाग पर देखकर बहुत अच्‍छा लगा। और फिर इस गजल को पढ़कर तो लगा कि मैं तुम्‍हारे ब्‍लाग पर नहीं आकर गलती कर रही थी। बहुत ही उम्‍दा गजल है, एक-एक शेर लाजवाब है। अब तुम्‍हारी पोस्‍ट जरूर देखी जाएगी।

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  18. आकण्ठ पत्रिका में आपकी ग़ज़ले प्रकाशित हुई हैं वाह मज़ा आगया!

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  19. प्रिय बंधुवर राजीव भरोल जी
    नमस्कार !
    पूरी ग़ज़ल के लिए शुरू में ही मुबारकबाद दे देता हूं , फिर भूल जाऊंगा कहीं …

    एक से बढ़ कर एक शे'र हैं

    दिया हाथों में कासा और सीने में दी ख़ुद्दारी,
    बता ऐ जिंदगी ऐसे भला क्‍यों आज़माती है

    कितना मा'सूम सवाल है !

    रहन रख आये आखिर हम उसूलों के सभी गहने,
    करें क्‍या भूख आकर रोज़ कुण्‍डी खटखटाती है


    राजीव भाई , दिल लूट लिया आपके इस शे'र ने …
    कुर्बान !!

    मुझे ही हो गई है तिश्‍नगी से दोस्‍ती वरना,
    कोई बदली मेरी छत पर बरसने रोज़ आती है


    भाई मेरे ! कभी किसी आमंत्रण को स्वीकार भी कर लेना चाहिए … :)

    आप जैसा सच्चा फ़नकार मिल जाए तो मेरा मन सलाम किए बिना नहीं रह पाता … सलाम आपकी लेखनी को !

    नई ग़ज़ल लगाएं तो मेल ज़रूर कर दें , प्लीज़ !

    शुभकामनाओं सहित …
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  20. मै तो पढ ही नही पाई इसे जब कि मेरी ब्लागलिस्ट मे नाम हैतुम्हारा। चलो देर आये दुरुस्त आये। कमाल की गज़ल है ये तीन शेर तो लाजवाब बन पडे हैं
    ये पत्थर तोड़ते बच्चे ज़मीं से हैं जुड़े कितने,
    पसीने में घुली मिटटी गले इनको लगाती है.

    मुझे ही हो गई है तिश्‍नगी से दोस्‍ती वरना,
    कोई बदली मेरी छत पर बरसने रोज़ आती है.

    जहाँ में माँ की ममता से घनी और छांव क्या होगी,
    मुझे पाला, मेरे बच्चों को भी लोरी सुनाती है.
    बहुत बहुत बधाई ।

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  21. जहाँ में माँ की ममता से घनी और छांव क्या होगी,
    मुझे पाला, मेरे बच्चों को भी लोरी सुनाती है.


    bahut badhiya
    abhaar

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  22. दिया हाथों में कासा और सीने में दी ख़ुद्दारी,
    बता ऐ जिंदगी ऐसे भला क्‍यों आज़माती है.

    रहन रख आये आखिर हम उसूलों के सभी गहने,
    करें क्‍या भूख आकर रोज़ कुण्‍डी खटखटाती है.

    तारीफ़ के लिये ग़ज़ल के मेयार के अल्फ़ाज़ ढूंढने पड़ रहे हैं
    बेहद उम्दा ग़ज़ल !सुबहान अल्लाह!
    अल्लाह करे ज़ोरे क़लम और ज़्यादा

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  23. "रहन रख आये आखिर हम उसूलों के सभी गहने,
    करें क्‍या भूख आकर रोज़ कुण्‍डी खटखटाती है.



    जहाँ में माँ की ममता से घनी और छांव क्या होगी,
    मुझे पाला, मेरे बच्चों को भी लोरी सुनाती है."

    राजीव भाई, इस पूरी ग़ज़ल ने मन को मोहा, ऊपर के इन दो शेरों की तारीफ मे तो जो भी कहे वो कम है.

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