शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

ग़ज़ल: जो कल तक नोंचता था बाल अब पत्थर दिखाता है

बड़ी शिद्दत से पहले तो वो अपने घर बुलाता है,
मगर एहसान फिर बातों ही बातों में जताता है.

भले ही साथ रहते हैं मगर बातें नहीं होतीं,
मैं घर से सुबह जब निकलूँ वो वापिस घर पे आता है.

ठगा जाता हूँ जब भी तो यही मैं सोच लेता हूँ,
जो दिल का साफ होता है वही धोखा भी खाता है.

भला कैसे बताऊँ अपने दिल का हाल मैं उसको,
मेरी बातों को वो अक्सर हंसी में ही उड़ाता  है.

झगड़ता है जो वो मुझसे तो दुश्मन मत समझ लेना,
बहुत है पास वो दिल के तभी तो दिल दुखाता है.

कहीं दीवानगी उसकी तुम्हारे घर पे ना बरसे,
जो कल तक नोंचता था बाल अब पत्थर दिखाता है.

बह्र: हजज मुसम्मन सालिम (१२२२ १२२२ १२२२ १२२२)

25 टिप्‍पणियां:

  1. झगड़ता है जो वो मुझसे तो दुश्मन मत समझ लेना,
    बहुत है पास वो दिल के तभी तो दिल दुखाता है.

    बहुत सटीक बात कह दी ..खूबसूरत गज़ल

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  2. झगड़ता है जो वो मुझसे तो दुश्मन मत समझ लेना
    बहुत है पास वो दिल के तभी तो दिल दुखाता है।
    विरोधाभासों का नाम ही ज़िदगी है...इस तथ्य का सुंदर उदाहरण इस शे‘र में है...अच्छी ग़ज़ल।

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  3. भले ही साथ रहते हैं मगर बातें नहीं होतीं,
    मैं घर से सुबह जब निकलूँ वो वापिस घर पे आता है.
    बहुत खूब आज कल दोनो की नौकरी मे यही हो रहा है।

    ठगा जाता हूँ जब भी तो यही मैं सोच लेता हूँ,
    जो दिल का साफ होता है वही धोखा भी खाता है.
    सही बात है।

    झगड़ता है जो वो मुझसे तो दुश्मन मत समझ लेना,
    बहुत है पास वो दिल के तभी तो दिल दुखाता है.
    लाजवाब गज़ल है । बधाई।

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  4. hahahah....mere sath to googly ho gayi rajeev bhai .....main hafte bhar se isi behar me atka hun ..aur aaj isse bahar nikal ke likhne ki koshish kar raha tha ki aapko padhne aa gaya...aapne to mujhe fir isi me fansa diya...heheh...par behtareen ghazal hai ....

    भले ही साथ रहते हैं मगर बातें नहीं होतीं,
    मैं घर से सुबह जब निकलूँ वो वापिस घर पे आता है.

    han mera ek dost call centre me tha uske ghar main gaya tha yahi hua..fir maine jana chhod diya...hehehe


    haan baki ki pooori ghazal achhi hai

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  5. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (4/10/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

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  6. वंदना जी, धन्यवाद. चर्चामंच पर अवश्य जाऊंगा.

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  7. सराहनीय पोस्ट के लिए बधाई .

    कृपया इसे भी पढ़े - -

    बीजेपी की वेबसाइट में हाथ साफ http://www.ashokbajaj.com

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  8. सारे शेर उम्दा हैं , सराहनीय और शानदार गजल ।

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  9. ठगा जाता हूँ जब भी तो यही मैं सोच लेता हूँ,
    जो दिल का साफ होता है वही धोखा भी खाता है.
    bahut khoob....


    झगड़ता है जो वो मुझसे तो दुश्मन मत समझ लेना,
    बहुत है पास वो दिल के तभी तो दिल दुखाता है.
    bahut achha likha hai ....

    bahut achhi gazal ki taaseer...

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  10. अब जिंदगी की क्या कहें हजूर,
    गोया बिन बारूद का धमाका है ....

    जारी रखिये ....

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  11. झगड़ता है जो वो मुझसे तो दुश्मन मत समझ लेना,
    बहुत है पास वो दिल के तभी तो दिल दुखाता है.
    राजीव भाई पिछले दस दिनों से नेट से दूर रहा इसलिए आपकी ग़ज़ल तक पहुँचने में देरी हुई...क्षमा करें...बेहतरीन ग़ज़ल कही है आपने...जिस पर गुरुदेव की कृपा हो उसकी कलम में माँ सरस्वती खुद बिराजमान हो जाती है...एक एक शेर दोहराने और गुनगुनाने लायक है...दाद कबूल करें...
    नीरज

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  12. ख़ूबसूरत भावपूर्ण मुकम्मल ग़ज़ल। जिसका हर शे'र अपनी पुख़्तगी का अहसास कराता है।

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  13. भला कैसे बताऊँ अपने दिल का हाल मैं उसको,
    मेरी बातों को वो अक्सर हंसी में ही उड़ाता है.

    वाह बेहतरीन ग़ज़ल !

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  14. ठगा जाता हूँ जब भी तो यही मैं सोच लेता हूँ,
    जो दिल का साफ होता है वही धोखा भी खाता है.

    bahut khoob !
    seedhe shabdon main badi baat kehnaa to koi aapse seekhe.

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  15. भले ही साथ रहते हैं मगर बातें नहीं होतीं,
    मैं घर से सुबह जब निकलूँ वो वापिस घर पे आता है.
    bahut hee sahi bat likhi hai aapne....khoobsurat gazal ke liye bahut bahut badhai

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  16. हजज पे लिखने का अपना एक अलग आनंद होता है, अच्छे शेर कहें हैं.
    "ठगा जाता हूँ जब भी तो यही मैं सोच लेता हूँ,
    जो दिल का साफ होता है वही धोखा भी खाता है"
    सीधे और सधे लफ़्ज़ों में सटीक बात kahi है.

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  17. सुन्दर रचना। बधाई।आपको व आपके परिवार को भी दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें।

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  18. खजाना मिल जाने से कम नहीं है, आपके ब्लौग पर आकर आपकी रचनाओं का रस लेना! वाह! वाह! और वाह! सबकी सब एक से बडकर एक!

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  19. ग़ज़ल कहने का बेहतर सलीक़ा
    अश`आर से बात करने का खूबसूरत हुनर
    शाईरी से मिल बैठने का नफ़ीस अंदाज़ ...
    जाने क्या क्या नहीं लिए जा रहा हूँ आपके ब्लॉग से...
    बहुत ही उम्दा और पुख्ता पेशकश
    मुबारकबाद .

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  20. देहरादून से छपने वाली साहित्यिक पत्रिका
    "सरस्वती-सुमन" के ग़ज़ल-विशेषांक के लिए
    आपकी २/३ गज़लें भिजवाना चाहता हूँ ...
    उम्मीद के साथ भरोसा भी है
    कि इजाज़त फ़रमाएंगे

    "daanish" bhaarti
    dkmuflis@gmail.com

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  21. बहुत अच्छे मतले से शुरुआत और जैसे जैसे आगे बढ़े लगा कि खत्म क्यों हुई ग़ज़ल ,
    ख़ास तौर पर ये शेर

    ठगा जाता हूँ जब भी तो यही मैं सोच लेता हूँ,
    जो दिल का साफ होता है वही धोखा भी खाता है.

    तो आगे बढ़ने से रोकता रहा
    ख़ूबसूरत ग़ज़ल ,मुबारक हो

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  22. झगड़ता है जो वो मुझसे तो दुश्मन मत समझ लेना,
    बहुत है पास वो दिल के तभी तो दिल दुखाता है.
    क्या बात है राजीव जी.

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