सोमवार, 22 नवंबर 2010

ग़ज़ल: दुआ करो कि मैं इक दिन फ़कीर हो जाऊं.

मैं चाहता हूँ मैं सचमुच अमीर हो जाऊँ,
दुआ करो कि मैं इक दिन फ़कीर हो जाऊँ.

तेरी हयात में कुछ दख़्ल तो रहे मेरा,
मैं तेरे हाथ की कोई लकीर हो जाऊँ.

तू अपने आपसे मुझको अलग न कर पाए,
जो मेरे बस में हो तेरा ज़मीर हो जाऊँ.

ये जिंदगी के मसाइल भी मेरे हमदम हैं,
मैं तेरी ज़ुल्फ़ का कैसे असीर हो जाऊँ.

ये मुफ़लिसी है जो रखती है राह पर मुझको,
भटक ही जाऊँ, कहीं जो अमीर हो जाऊँ.

हयात = जिंदगी, असीर = कैदी, मसाइल = समस्याएँ, मुफलिसी = गरीबी.
 
बह्र: मुजतस मुसमन मखबून महजूफ
मुफाएलुन-फएलातुन-मुफाएलुन-फएलुन(/फालुन), 1212-1122-1212-22(/112)

13 टिप्‍पणियां:

  1. मैं चाहता हूँ मैं सचमुच अमीर हो जाऊँ,
    दुआ करो कि मैं इक दिन फ़कीर हो जाऊँ.
    बहुत खूब,
    मै अल्लाह से आपकी गुजारिश क़ुबूल करने की दुआ करूगा.
    --

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  2. अच्छा प्रयास है साहब, जारी रखिये .....

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  3. वाह! राजीव जी वाह! सुन्दर ख्याल! और गर कुछ कहूँ तो बस इतना ही के:

    "ये फ़कीरी लाख नियामत है, संभाल वर्ना,
    इसे भी लूट के ले जायेंगे ज़माने वाले!"

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  4. तेरी हयात में कुछ दख़्ल तो रहे मेरा,
    मैं तेरे हाथ की कोई लकीर हो जाऊँ.
    राजीव जी बहुत दिनों के बाद आपको पढ़ रहा हूँ ..क्योंकि हमेशा ही आप से उम्मीदे बड़ी रहती है
    और इस खूबसूरत गजल के बारे में सिर्फ इतना ही कहूँगा ..कि इतनी खूबसूरत ग़ज़ल सिर्फ आप ही लिख सकते हैं
    स्वागत के साथ vijayanama.blogspot.com

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  5. मैं तेरी हाथों की लकीर हो जाऊं।
    अच्छी ग़ज़ल , राजीव जी को बधाई।

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  6. मैं चाहता हूँ मैं सचमुच अमीर हो जाऊँ,
    दुआ करो कि मैं इक दिन फ़कीर हो जाऊँ.

    बेहतरीन ... प्रभावी अभिव्यक्ति ....सीधे स्पष्ट मनोभाव....

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  7. तू अपने आपसे मुझको अलग न कर पाए,
    जो मेरे बस में हो तेरा ज़मीर हो जाऊँ.

    बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल है,ख़ास तौर पर ये शेर तो बिल्कुल नए अंदाज़ का है ,एक लफ़्ज़ में कहें तो ’अद्भुत’
    उम्दा शायरी !बहुत ख़ूब!

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  8. तेरी हयात में कुछ दख़्ल तो रहे मेरा,
    मैं तेरे हाथ की कोई लकीर हो जाऊँ.
    हर एक शेर कमाल का। बहुत अच्छी लगी गज़ल। बधाई।

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  9. आपकी रचना पढकर बस यही लगा कि जितनी भी वाह वाह की जाए कम है ...वाह!
    जारी रहें.
    ---
    कुछ ग़मों के दीये

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  10. राजीव जी,
    मतले से लेकर आखिरी शेर तक, मज़ा आ गया, एक शेर पढने के बाद चाह बढती कि अगला क्या होगा और अगला शेर उससे भी बढ़कर और खूबसूरत निकलता, जब आखिरी शेर पे पहुंचा तो लगा काश और शेर होते मगर फिर मतले से शुरुआत कर दी..............ना जाने कितनी बार पढ़ चुका हूँ ये ग़ज़ल.
    कुछ कहने को भी लफ्ज़ ढूँढने पढ़ रहे हैं, इतनी बेहतरीन ग़ज़ल जो है.
    उस्तादों वाला रंग है और उस्तादों वाली कहन भी है.

    क्या खूब मतला कहा है, और उसके बाद का शेर तो अहा".........तेरी हयात में कुछ दख़्ल तो रहे मेरा".
    "तू अपने आपसे मुझको अलग....." वाह वा
    "ये जिंदगी के मसाइल भी मेरे हमदम हैं....." वाह वाह वाह
    और आखिरी शेर तो जबरदस्त है,
    "ये मुफ़लिसी है जो रखती है राह पर मुझको,
    भटक ही जाऊँ, कहीं जो अमीर हो जाऊँ."

    आप की ये ग़ज़ल अपने साथ सहेज के ले जा रहा हूँ.

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  11. one of the best ghazals i have read in last few months....feeling jealous of you, rajiv.

    last sher is carrying ustaadaana touch...

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  12. आज कल हर तरफ बस राजीव भाई ही छाये हुए हैं ! मेरे ख़याल से इस ग़ज़ल की तारीफ़ दूसरी बार कर रहा हूँ एक बार तो आपको निजी तौर पर बधाई दे चुका हूँ ! आपकी सारी ग़ज़लों मे से सबसे क़ामयाब ग़ज़ल है ये वाली ! फिर से बहुत बधाई !

    अर्श

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