रविवार, 19 दिसंबर 2010

ग़ज़ल: जिसको काँटा नहीं चुभा होगा.

जिसको काँटा नहीं चुभा होगा,
वो कहाँ रात भर जगा होगा.

धुंध बिखरी हुई है आंगन में,
उसने बादल को छू लिया होगा.

दिल की बस्ती में रौशनी कैसी,
वो इसी राह से गया होगा.

जम के बरसा था रात भर बादल,
ज़ख्म कच्चा था खुल गया होगा.

बंद कर के सभी झरोखों को,
मन की खिड़की वो खोलता होगा.

उसकी हर बात है गज़ल जैसी,
घर में खुशबू बिखेरता होगा.

मतलबी इस कदर नहीं था वो,
शहर आदत सी बन गया होगा.

कितने हिस्सों में बट गई खुशबू,
तुम ये कहते थे क्या नया होगा?

बह्र: खफीफ मुसद्दस मख्बून मक्तुअ/मुसद्दस अस्तर
फायलुन फायलुन मफाईलुन (२१२ २१२ १२२२)
 

14 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी ग़ज़ल।
    "इस कदर मतलबी नहीं था वो'
    शहर आदत सी बन गया होगा।" इस मिसरे के
    कथ्य ( भाव) को मैं पकड़ नहीं पा रहा हूं।

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  2. जम के बरसा था रात भर बादल,
    ज़ख्म कच्चा था खुल गया होगा.
    शेर अच्छा लगा, बधाई!!

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  3. डा संजय दानी जी,
    अगर शेर पहली बार में पढ़ने वाले को समझ ना आये तो उस शेर को मैं Dead-on-arrival समझता हूँ. फिर भी explain करने की कोशिश करता हूँ. वयस्त शहर में मतलबी लोगों के बीच में रह कर वो शख्स जो ऐसा नहीं था, भी वैसा ही मतलबी हो गया है..शहर की आदतों को अपना लिया है.

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  4. बंद कर के सभी झरोखों को,
    मन की खिड़की वो खोलता होगा.
    दुनिया से कट कर ही आदमी अपने अन्दर झाँकता है।

    उसकी हर बात है गज़ल जैसी,
    घर में खुशबू बिखेरता होगा.
    बहुत खूब \

    मतलबी इस कदर नहीं था वो,
    शहर आदत सी बन गया होगा.
    बिलकुल सही कहा। रोज़ी रोटी के लिये घर से बाहर जाना[ शहर ] भी एक मजबूरी होती है। बधाई इस गज़ल के लिये।

    राजीव बहुत ही अच्छे लगे ये शेर। वाकई

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  5. क्या बतायें, पहली दो पंक्तियाँ पढ़ अभिभूत हो गये।

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  6. जम के बरसा था रात भर बादल,
    ज़ख्म कच्चा था खुल गया होगा.

    भाई वाह..जिंदाबाद...राजीव भाई इस बेहतरीन गज़ल के लिए दिली दाद कबूल करें...

    नीरज

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  7. धुंध बिखरी हुई है आंगन में,
    उसने बादल को छू लिया होगा.

    ऐसे नायाब अश`आर .... !
    ग़ज़ल के आँगन में
    मानो हज़ारों हज़ारों फूल महक रहे हैं
    मुबारकबाद

    नव वर्ष २०११ के लिए मंगलकामनाएं

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  8. धुंध बिखरी हुई है आंगन में
    उस ने बादल को छू लिया होगा

    जम के बरसा था रात भर बादल,
    ज़ख्म कच्चा था खुल गया होगा

    बेहतरीन !
    ग़ज़ल के तक़ाज़ों को पूरा करती हुई ख़ूबसूरत ग़ज़ल
    बहुत उम्दा

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  9. bilkul tjataren content se saji sawnri ek behtaren gazal kahne ke liye aapko badhai wish you a happy new year

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  10. बहुत प्यारी गज़ल कही है
    ढेर सारी बधाई

    कितने हिस्सों में बट गई खुशबू,
    तुम ये कहते थे क्या नया होगा?

    इस शेर के तो क्या कहने
    बस मज़ा आ गया

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  11. राजीव जी,
    हासिल-ए-ग़ज़ल शेर तो ये ही है,
    "कितने हिस्सों में बट गई खुशबू,
    तुम ये कहते थे क्या नया होगा?"
    वाह वा, बहुत उम्दा कहन है, मज़ा आ गया.
    जितनी तारीफ करूं उतनी कम.

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  12. प्रिय बंधुवर राजीव भरोल जी
    अभिवादन !
    क्षमा चाहता हूं , बीच में कई बार आ'कर ग़ज़लों का लुत्फ़ उठाने के बाद भी हस्ताक्षर नहीं छोड़ कर जा सका ।
    आप ख़ूबसूरत ग़ज़लें बहुत हुनर और सलीके से लिखा करते हैं … !
    आज भी बहुत अच्छी ग़ज़ल पढ़ने को मिली, शुक्रिया !

    दानीजी के सवाल के उत्तर में मेरी भी जिज्ञासा शांत हुई ।

    उसकी हर बात है गज़ल जैसी,
    घर में खुशबू बिखेरता होगा.

    इस शे'र पर फ़िदा हो गया हूं … मुबारकबाद !

    गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं !

    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  13. Rajiv ji namaskaar
    kyaa aapko 'Saraswati-suman' ka
    "gazal-visheshaank"
    mil gayaa hai ??

    'daanish' bhaarti

    dkmuflis@gmail.com

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