मंगलवार, 29 नवंबर 2011

ग़ज़ल: दीप खुशियों के जल उठे हर सू


इस वर्ष दीपावली के अवसर पर श्री पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर आयोजित तरही मुशायरे में कही गई मेरी गज़ल पेश-ए-खिदमत है. तरही मिसरा था "दीप खुशियों के जल उठे हर सू". समाअत फरमाएं.

मैंने चाहा था सच दिखे हर सू,
उसने आईने रख दिए हर सू.

ख्वाहिशों को हवस के सहरा में,
धूप के काफिले मिले हर सू.

लोग जल्दी में किसलिए हैं यहाँ,
हडबडाहट सी क्यों दिखे हर सू?

कांच के घर हैं, टूट सकते हैं,
यूं न पत्थर उछालिए हर सू.

फूल भी नफरतों के मौसम में,
खार बन कर बिखर गए हर सू.

लौट आया वो रौशनी बन कर,
"दीप खुशियों के जल उठे हर सू.”

रविवार, 11 सितंबर 2011

ग़ज़ल: कहीं चौखट कहीं छप्पर नहीं है.

कहीं चौखट कहीं छप्पर नहीं है,
यहाँ कोई मुकम्मल घर नहीं है.

सुकूँ से पाँव फैलाऊं तो कैसे,
मेरी इतनी बड़ी चादर नहीं है.

अना के दायरे में जीते रहना,
किसी भी कैद से कमतर नहीं है.

मैं मुद्दत बाद तुमसे मिल रहा हूँ,
खुशी से आँख फिर क्यों तर नहीं है?

नज़र डाली तो है उसने इधर भी,
मगर उसकी नज़र मुझ पर नहीं है!

अजब ये संगसारी है! बज़ाहिर,
किसी के हाथ में पत्थर नहीं है.

-राजीव भरोल 'राज़'

रविवार, 31 जुलाई 2011

ग़ज़ल: मेरा कहा उन्हें अच्छा मगर नहीं लगता

बुलंदियों से हमें यूँ तो डर नहीं लगता
पर आसमां पे बना घर भी घर नहीं लगता.

मैं उनके सामने सच बात कह तो देता हूँ,
मेरा कहा उन्हें अच्छा मगर नहीं लगता.

झुका के सर को अगर उसके दर पे जाते तो,
तुम्हारा इस तरह चौखट से सर नहीं लगता.

फलों से खूब लदा पेड़ है यकीनन वो,
मगर जो छांव दे, ऐसा शजर* नहीं लगता

वो राहे इश्‍क में चल तो पड़ा है, लेकिन वो,
सफर की मुश्किलों से बाखबर नहीं लगता,

हमें तो हर घड़ी पगड़ी की फ़िक्र रहती है,
वगैर इस के ये सर भी तो सर नहीं लगता.

खुदा का शुक्र है अब तक तो मेरे बच्चों पर,
नई हवा का ज़रा भी असर नहीं लगता.

-राजीव भरोल 'राज़'
 * शजर = पेड़
बह्रे मुज्‍तस मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ
मुफायलुन फयलातुन मुफायलुन फैलुन (1212 1122 1212 22)

शनिवार, 25 जून 2011

ग़ज़ल: हमारे ज़ख्म तो भरते दिखाई देते हैं.


जहाँ कहीं हमें दाने दिखाई देते हैं,
वहीँ पे जाल भी फैले दिखाई देते हैं.

मैं कैसे मान लूं बादल यहाँ भी बरसा है,
यहाँ तो सब मुझे प्यासे दिखाई देते हैं.

तुम्हारा दर्द भी तुमसा ही बेवफा निकला,
हमारे ज़ख्म तो भरते दिखाई देते हैं.

कभी तो चाँद को मेरी नज़र से भी देखो,
नहीं दिखेंगे जो धब्बे दिखाई देते हैं.

अगर ये हाथ बढ़ाएं तो आसमां छू लें,
जो कद में आपको छोटे दिखाई देते है.

सियासी भीड़ में उंगली उठाएं किस किस पर,
सब इस हमाम में नंगे दिखाई देते हैं.

मैं सोचता था हवा ने बुझा दिए होंगे,
मेरे चिराग तो जलते दिखाई देते हैं,

बह्रे मुज्‍तस मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ
मुफायलुन फयलातुन मुफायलुन फैलुन (1212 1122 1212 22)

बुधवार, 25 मई 2011

ग़ज़ल: मुहब्बत का कभी इज़हार करना ही नहीं आया.

मुहब्बत का कभी इज़हार करना ही नहीं आया,
मेरी कश्ती को दरिया पार करना ही नहीं आया.


जिसे जो चाहिए था तोड़ कर वो ले गया उनसे,
दरख्तों को कभी इनकार करना ही नहीं आया.


हमारे दोस्तों ने हाथ में खंजर थमाया भी,
मगर दुश्मन पे हमको वार करना ही नहीं आया.


इधर नज़रें मिलीं और तुम उधर दिल हार भी बैठे,
मेरी जाँ तुमको आँखें चार करना ही नहीं आया.


मैं दुनिया ही का हो कर रह गया होता मगर इसको,
मुहब्बत से कभी इसरार करना ही नहीं आया.

-राजीव भरोल 'राज़'

बह्र: हजज मुसम्मन सालिम  (मफ़ाई लुन  X 4)                                      

शनिवार, 7 मई 2011

ग़ज़ल: वो चाहता तो मेरे साथ चल भी सकता था.

तुम्हारी सोच के सांचे में ढल भी सकता था,
वो आदमी ही था इक दिन बदल भी सकता था.

हमारा एक ही रस्ता था एक ही मंजिल,
वो चाहता तो मेरे साथ चल भी सकता था.

ज़मीर की सभी बातें जो मानने लगते,
हमारे हाथ से मौका निकल भी सकता था.

लहू था सर्द वहाँ पर सभी का मुद्दत से,
अगर तुम आंच दिखाते उबल भी सकता था.

चिराग मैंने बुझाये थे अपने हाथों से,
मैं जानता हूँ मेरा हाथ जल भी सकता था.

हर इक सफर में जो चुभता था पाँव में मेरे,
मैं चाहता तो वो काँटा निकल भी सकता था.

उठा के चाँद को थाली में उसकी रख देते,
ज़रा सी बात थी बच्चा बहल भी सकता था.


बह्रे मुज्‍तस मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ
मुफायलुन फयलातुन मुफायलुन फैलुन (1212 1122 1212 22)

मंगलवार, 8 मार्च 2011

ग़ज़ल: ये आंसुओं का ग़लत इस्तेमाल है साहब.


पड़ा हुआ जो ये पानी में जाल है साहब,
यकीन जानिये दरिया की चाल है साहब.

खिलाफ ज़ुल्म के गुस्सा है जो ये लोगों में,
ज़रा सी देर का केवल उबाल है साहब.

हरेक बात पे रो रो के बात मनवाना,
ये आंसुओं का ग़लत इस्तेमाल है साहब.

सुकूने दिल से है दौलत का वैर जग ज़ाहिर,
अमीर है वो मगर ख़स्ताहाल है साहब.

नदी में रह के मगरमछ से वैर रखता है,
उस आदमी की भी हिम्मत कमाल है साहब.

कहाँ कहाँ मेरे हिस्से के ख़्वाब बिखरे हैं,
हमारी नींद का जायज सवाल है साहब.

गरीब के तो हैं सपने भी रोज़मर्रा के,
किराया घर का या रोटी या दाल है साहब.

मैं टूटते हुए घर को बचा नहीं पाया,
अभी तलक मुझे इसका मलाल है साहब.

बह्रे मुज्‍तस मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ
मुफायलुन फयलातुन मुफायलुन फैलुन (1212 1122 1212 22)

सोमवार, 31 जनवरी 2011

ग़ज़ल: किसी सूरत गमे दिल का मदावा हो नहीं सकता.


किसी सूरत ग़मे दिल का मदावा हो नहीं सकता,
समंदर हो चुका हो जो वो दरिया हो नहीं सकता.


हमारे दिल की फितरत भी है कुछ कुछ दोस्तों जैसी,
हमारा होके भी ज़ालिम, हमारा हो नहीं सकता.


रकीबों से गले मिल मिल के करना प्यार की बातें,
महज मुझको जलाना तो इरादा हो नहीं सकता.


मेरे हमदम तेरी बातें भुला देती हैं गम सारे,
मगर बातों से तो घर का गुज़ारा हो नहीं सकता.


हुए हैं किसलिए मोहताज हम सूरज की किरणों के,
अगर सूरज न निकले क्या सवेरा हो नहीं सकता?


ठिकाना ढूंढती है शहर में आवारगी मेरी,
मगर बहती हवा का तो ठिकाना हो नहीं सकता.


वो फूलों, तितलियों की चाप से भी थरथराता है,
कोई हालात का इतना सताया हो नहीं सकता.


बह्र: हजज मुसम्मन सालिम
मफ़ाईलुन X 4 (1222 X 4)