सोमवार, 31 जनवरी 2011

ग़ज़ल: किसी सूरत गमे दिल का मदावा हो नहीं सकता.


किसी सूरत ग़मे दिल का मदावा हो नहीं सकता,
समंदर हो चुका हो जो वो दरिया हो नहीं सकता.


हमारे दिल की फितरत भी है कुछ कुछ दोस्तों जैसी,
हमारा होके भी ज़ालिम, हमारा हो नहीं सकता.


रकीबों से गले मिल मिल के करना प्यार की बातें,
महज मुझको जलाना तो इरादा हो नहीं सकता.


मेरे हमदम तेरी बातें भुला देती हैं गम सारे,
मगर बातों से तो घर का गुज़ारा हो नहीं सकता.


हुए हैं किसलिए मोहताज हम सूरज की किरणों के,
अगर सूरज न निकले क्या सवेरा हो नहीं सकता?


ठिकाना ढूंढती है शहर में आवारगी मेरी,
मगर बहती हवा का तो ठिकाना हो नहीं सकता.


वो फूलों, तितलियों की चाप से भी थरथराता है,
कोई हालात का इतना सताया हो नहीं सकता.


बह्र: हजज मुसम्मन सालिम
मफ़ाईलुन X 4 (1222 X 4)