सोमवार, 31 जनवरी 2011

ग़ज़ल: किसी सूरत गमे दिल का मदावा हो नहीं सकता.


किसी सूरत ग़मे दिल का मदावा हो नहीं सकता,
समंदर हो चुका हो जो वो दरिया हो नहीं सकता.


हमारे दिल की फितरत भी है कुछ कुछ दोस्तों जैसी,
हमारा होके भी ज़ालिम, हमारा हो नहीं सकता.


रकीबों से गले मिल मिल के करना प्यार की बातें,
महज मुझको जलाना तो इरादा हो नहीं सकता.


मेरे हमदम तेरी बातें भुला देती हैं गम सारे,
मगर बातों से तो घर का गुज़ारा हो नहीं सकता.


हुए हैं किसलिए मोहताज हम सूरज की किरणों के,
अगर सूरज न निकले क्या सवेरा हो नहीं सकता?


ठिकाना ढूंढती है शहर में आवारगी मेरी,
मगर बहती हवा का तो ठिकाना हो नहीं सकता.


वो फूलों, तितलियों की चाप से भी थरथराता है,
कोई हालात का इतना सताया हो नहीं सकता.


बह्र: हजज मुसम्मन सालिम
मफ़ाईलुन X 4 (1222 X 4)

16 टिप्‍पणियां:

  1. अरे वाह वाह वाह

    अरे मैं क्या कहूँ

    गज़ल पढ़ कर दिल कि धडकन तेज हो गई जैसे वर्षों बाद किसी अपने से मिल कर होता है

    राजीव जी आप हर बार चौकाते जा रहे हैं

    लाज़वाब कर दिया
    काश मैं भी ऐसी गज़ल लिखने के काबिल होता

    पता नहीं इस गज़ल को पढ़ कर मैं खुश ज्यादा हूँ या मुझे जलन ज्यादा हो रही है
    जितना खुश होता हूँ उतनी ही आपसे ईष्या होती जा रही है

    साहब इस एक गज़ल पे मेरा सब कुछ कुर्बान

    आपकी बा तब कि सबसे उम्दा गज़ल
    ला....जवाब

    दिल खुश हो गया

    पता नहीं क्या क्या लिखता जा रहा हूँ ....:)

    एक बार फिर से बधाई

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  2. ठिकाना ढूंढती है शहर में आवारगी मेरी,
    मगर बहती हवा का तो ठिकाना हो नहीं सकता.
    वो फूलों, तितलियों की चाप से भी थरथराता है,
    कोई हालात का इतना सताया हो नहीं सकता.
    ......वाह! बहुत खूब!

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  3. ठिकाना ढूँढती है ... इस शे'र के लिए जीतनी दाद दूँ कम है ! वाकई छाये हुए हो आप ग़ज़ल की दुनिया में ! वाकई फक्र है आप पर !


    अर्श

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  4. अगर सूरज न निकले ति क्या सबेरा नही हो सकता।
    बेहतरीन शे'र , मुकम्मल गज़ल। मुबारकबाद।

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  5. behad khubsurat ghazal hai rajeev bhai... kaabile tareef... aur aakhir ke do sher to jitni daad le jaayen kam hai

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  6. ओह...अतिसुन्दर...आभार


    एक एक शेर सुभानअल्लाह...

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  7. रकीबों से गले मिल मिल के करना प्यार की बातें,
    महज मुझको जलाना तो इरादा हो नहीं सकता.

    ठिकाना ढूंढती है शहर में आवारगी मेरी,
    मगर बहती हवा का तो ठिकाना हो नहीं सकता.


    राजीव जी, बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने............
    मेरे ब्लॉग पर कमेंट्स करने का शुक्रिया, वर्ना मैं आपके ब्लॉग तक न पहुँच पाता.

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  8. वाह राजीव वाकई तुम गज़लों मे कमाल करने लगे हो।
    हमारे दिल की फितरत भी है कुछ कुछ दोस्तों जैसी,
    हमारा होके भी ज़ालिम, हमारा हो नहीं सकता.

    ठिकाना ढूंढती है शहर में आवारगी मेरी,
    मगर बहती हवा का तो ठिकाना हो नहीं सकता.
    लाजवाब शेर हैं ये दोनो बाकी शेर भी बहुत ही अच्छे लगे। बधाई इस गज़ल के लिये।

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  9. शब्द छांट छांट कर गजल लिखी है आपने...
    बहुत सुन्दर....
    एक छोटा सा इन्द्रधनुष हमारा भी है...
    वसंत पंचमी की शुभकामना....

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  10. बहुत सुन्दर रचना।

    वसंत पंचमी की शुभकामना|

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  11. रकीबों से गले मिल मिल के करना प्यार की बातें,
    महज मुझको जलाना तो इरादा हो नहीं सकता.
    राजीव जी
    आपकी गजलें दिल की गहराईयों से निकली हैं ...बहुत सुंदर प्रस्तुतीकरण है आपका

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  12. राजीव जी
    इतनी त्वरित प्रतिक्रिया के लिए आपका आभार ...चलो दोस्ती पक्की कर लेते हैं ....आप हमारे चंबा गए हैं ...आपने बताया अच्छा लगा भाई ..अब दुबारा आओगे तो जरुर बताना ...मुझे इन्तजार रहेगा ...हार्दिक शुभकामनायें

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  13. राजीव जी,
    आप की कलम में अजब धार है जो लफ़्ज़ों को बेहद खूबसूरत अंदाज़ में संवार कर उसे ग़ज़ल की शक्ल दे देती है. आप की ग़ज़लें, पढने मए अलग ही मज़ा आता है. क्या खूब मिसरा है, " समंदर हो चुका हो जो वो दरिया हो नहीं सकता"
    अहा.............कमाल का शेर
    हमारे दिल की फितरत भी है कुछ कुछ दोस्तों जैसी,
    हमारा होके भी ज़ालिम, हमारा हो नहीं सकता.
    वाह वा, बहुत खूब
    मेरे हमदम तेरी बातें भुला देती हैं गम सारे,
    मगर बातों से तो घर का गुज़ारा हो नहीं सकता.
    एक नहीं सोच, नहीं बात और उम्दा कहन
    हुए हैं किसलिए मोहताज हम सूरज की किरणों के,
    अगर सूरज न निकले क्या सवेरा हो नहीं सकता?

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  14. बहुत बढ़िया !! खूबसूरत शेरों से सजी ग़ज़ल के लिए बधाई, राजीव.

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