बुधवार, 25 मई 2011

ग़ज़ल: मुहब्बत का कभी इज़हार करना ही नहीं आया.

मुहब्बत का कभी इज़हार करना ही नहीं आया,
मेरी कश्ती को दरिया पार करना ही नहीं आया.


जिसे जो चाहिए था तोड़ कर वो ले गया उनसे,
दरख्तों को कभी इनकार करना ही नहीं आया.


हमारे दोस्तों ने हाथ में खंजर थमाया भी,
मगर दुश्मन पे हमको वार करना ही नहीं आया.


इधर नज़रें मिलीं और तुम उधर दिल हार भी बैठे,
मेरी जाँ तुमको आँखें चार करना ही नहीं आया.


मैं दुनिया ही का हो कर रह गया होता मगर इसको,
मुहब्बत से कभी इसरार करना ही नहीं आया.

-राजीव भरोल 'राज़'

बह्र: हजज मुसम्मन सालिम  (मफ़ाई लुन  X 4)                                      

शनिवार, 7 मई 2011

ग़ज़ल: वो चाहता तो मेरे साथ चल भी सकता था.

तुम्हारी सोच के सांचे में ढल भी सकता था,
वो आदमी ही था इक दिन बदल भी सकता था.

हमारा एक ही रस्ता था एक ही मंजिल,
वो चाहता तो मेरे साथ चल भी सकता था.

ज़मीर की सभी बातें जो मानने लगते,
हमारे हाथ से मौका निकल भी सकता था.

लहू था सर्द वहाँ पर सभी का मुद्दत से,
अगर तुम आंच दिखाते उबल भी सकता था.

चिराग मैंने बुझाये थे अपने हाथों से,
मैं जानता हूँ मेरा हाथ जल भी सकता था.

हर इक सफर में जो चुभता था पाँव में मेरे,
मैं चाहता तो वो काँटा निकल भी सकता था.

उठा के चाँद को थाली में उसकी रख देते,
ज़रा सी बात थी बच्चा बहल भी सकता था.


बह्रे मुज्‍तस मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ
मुफायलुन फयलातुन मुफायलुन फैलुन (1212 1122 1212 22)