शनिवार, 7 मई 2011

ग़ज़ल: वो चाहता तो मेरे साथ चल भी सकता था.

तुम्हारी सोच के सांचे में ढल भी सकता था,
वो आदमी ही था इक दिन बदल भी सकता था.

हमारा एक ही रस्ता था एक ही मंजिल,
वो चाहता तो मेरे साथ चल भी सकता था.

ज़मीर की सभी बातें जो मानने लगते,
हमारे हाथ से मौका निकल भी सकता था.

लहू था सर्द वहाँ पर सभी का मुद्दत से,
अगर तुम आंच दिखाते उबल भी सकता था.

चिराग मैंने बुझाये थे अपने हाथों से,
मैं जानता हूँ मेरा हाथ जल भी सकता था.

हर इक सफर में जो चुभता था पाँव में मेरे,
मैं चाहता तो वो काँटा निकल भी सकता था.

उठा के चाँद को थाली में उसकी रख देते,
ज़रा सी बात थी बच्चा बहल भी सकता था.


बह्रे मुज्‍तस मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ
मुफायलुन फयलातुन मुफायलुन फैलुन (1212 1122 1212 22)

23 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत प्यारी ग़ज़ल है.......
    मतला ता मक्ता हर शेर शानदार.... अभिव्यक्तियों में डूबा हुआ हर शेर !
    जबरदस्त रदीफ़ है दोस्त.....वाह वाह !
    तुम्हारी सोच के सांचे में ढल भी सकता था,
    वो आदमी ही था इक दिन बदल भी सकता था.


    हमारा एक ही रस्ता था एक ही मंजिल,
    वो चाहता तो मेरे साथ चल भी सकता था.

    ये शेर दिल को छू गया....
    उठा के चाँद को थाली में उसकी रख देते,
    ज़रा सी बात थी बच्चा बहल भी सकता था.

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  2. उठा के चाँद को थाली में उसकी रख देते,
    ज़रा सी बात थी बच्चा बहल भी सकता था.


    सुन्दर अहसास लिए अच्छी रचना।

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  3. चिराग मैंने बुझाये थे अपने हाथों से,
    मैं जानता हूँ मेरा हाथ जल भी सकता था

    बहुत प्यारी ग़ज़ल है.......
    वाह वाह वाह

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  4. उठा के चाँद को थाली में उसकी रख देते,
    ज़रा सी बात थी बच्चा बहल भी सकता था.


    राजीव जी आपकी ग़ज़ल में भाव की जो गहराई देखने को मिलाती है तो मन प्रसन्न हो जाता है

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  5. लहू था सर्द वहाँ पर सभी का मुद्दत से,
    अगर तुम आंच दिखाते उबल भी सकता था.
    सुन्दर भाव वाह! बहुत खुब .....

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  6. उठा के चाँद को थाली में उसकी रख देते,
    ज़रा सी बात थी बच्चा बहल भी सकता था.

    लखनऊ से अनवर जमाल .
    लखनऊ में आज सम्मानित किए गए सलीम ख़ान और अनवर जमाल Best Blogger

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  7. राजीव जी, ये बहर तो लग रहा है आपकी बेहद पसंदीदा है.

    इस शेर ने बहुत सोचने पे मजबूर कर दिया है,
    "उठा के चाँद को थाली में उसकी रख देते,
    ज़रा सी बात थी बच्चा बहल भी सकता था."
    दिली दाद कुबूल फरमाए.
    बहुत उम्दा शेर है.

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  8. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 10 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  9. चिराग मैंने बुझाये थे अपने हाथों से,
    मैं जानता हूँ मेरा हाथ जल भी सकता था.


    गहन भावों का सहज सरल सम्प्रेषण .....उम्दा पंक्तियाँ

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  10. उठा के चाँद को थाली में उसकी रख देते,
    ज़रा सी बात थी बच्चा बहल भी सकता था.

    बहुत ही खूब राजीव जी.
    आप बहुत ही अच्छा लिखते हैं.
    पूरी ग़ज़ल ही खूब है.
    आपकी कलम को सलाम.

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  11. jajjbaton ka sahaj jakhira pramudit karata hai -

    लहू था सर्द वहाँ पर सभी का मुद्दत से,
    अगर तुम आंच दिखाते उबल भी सकता था.

    khbsurat nazm .shukriya ji .

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  12. ज़मीर की सभी बातें जो मानने लगते,
    हमारे हाथ से मौका निकल भी सकता था.
    ग़ज़ल खूबसूरत है .
    साथ ही -
    बह्रे मुज्‍तस मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ
    मुफायलुन फयलातुन मुफायलुन फैलुन (1212 1122 1212 22)
    साथ ही - इस विधा पर और रौशनी दिखाएँ.

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  13. लहू था सर्द वहाँ पर सभी का मुद्दत से,
    अगर तुम आंच दिखाते उबल भी सकता था...

    वाह .. कितना लाजवाब मतला है और ये शेर और पूरी ग़ज़ल ... कमाल करते हो राजीव जी ...

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  14. ज़मीर की सभी बातें जो मानने लगते,
    हमारे हाथ से मौका निकल भी सकता था......मौजूदा दौर की तल्ख़ हकीकत बयां कर रहा है यह शेर. वाह!.... ग़ज़ल का हर शेर लाजवाब!.... बधाई!
    ---देवेंद्र गौतम

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  15. चाहता को क्या नहीं हो सकता था ...

    उठा के चाँद को थाली में उसकी रख देते,
    ज़रा सी बात थी बच्चा बहल भी सकता था...
    और यह तो बहुत ही लाजवाब है !

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  16. उठा के चाँद थाली --- वाह बहुत खूब। बधाई इस खूबसूरत गज़ल के लिये।

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  17. आखिरी शेर बहुत ही खूबसूरत है राजीव....बहुत ही सुंदर| किलो क्वींटल भर भर के दाद...
    ज़मीन कुछ जानी पहचानी सी है....

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  18. ज़मीर की सभी बातें जो मानने लगते,
    हमारे हाथ से मौका निकल भी सकता था

    इस खूबसूरत और पुख्ता शेर को पढने के बाद
    अभी आगे मन नहीं है क कही और जाकर
    कुछ और पढ़ा जाए .... वाह !
    बहुत शानदार ग़ज़ल !!

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  19. ज़मीर की सभी बातें जो मानने लगते,
    हमारे हाथ से मौका निकल भी सकता था

    khoobsoorat ghazal lekin ye sher to
    kamaal ka sher hai
    waah !!

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