बुधवार, 25 मई 2011

ग़ज़ल: मुहब्बत का कभी इज़हार करना ही नहीं आया.

मुहब्बत का कभी इज़हार करना ही नहीं आया,
मेरी कश्ती को दरिया पार करना ही नहीं आया.


जिसे जो चाहिए था तोड़ कर वो ले गया उनसे,
दरख्तों को कभी इनकार करना ही नहीं आया.


हमारे दोस्तों ने हाथ में खंजर थमाया भी,
मगर दुश्मन पे हमको वार करना ही नहीं आया.


इधर नज़रें मिलीं और तुम उधर दिल हार भी बैठे,
मेरी जाँ तुमको आँखें चार करना ही नहीं आया.


मैं दुनिया ही का हो कर रह गया होता मगर इसको,
मुहब्बत से कभी इसरार करना ही नहीं आया.

-राजीव भरोल 'राज़'

बह्र: हजज मुसम्मन सालिम  (मफ़ाई लुन  X 4)                                      

17 टिप्‍पणियां:

  1. मुहब्बत का कभी इज़हार करना ही नहीं आया,
    मेरी कश्ती को दरिया पार करना ही नहीं आया.


    जिसे जो चाहिए था तोड़ कर वो ले गया उनसे,
    दरख्तों को कभी इनकार करना ही नहीं आया.

    ...क्या खूब शेर कहे हैं राजीव जी!...अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारक हो...
    -----देवेंद्र गौतम

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  2. वाह, बहुत ही अच्छी। गजलें भा रही हैं अब।

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  3. जिसे जो चाहिए था तोड़ कर वो ले गया उनसे,
    दरख्तों को कभी इनकार करना ही नहीं आया.

    वाह...वाह...वाह...वाह...लाजवाब कर दिया राजीव भाई...क्या कमाल की ग़ज़ल कही है...दाद कबूल करो भाई...टोकरे भर कर...
    नीरज

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  4. वाह वाह। खुबसुरत गजल कही है आपने। आभार।

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  5. वाह वाह

    हर शेर लाजवाब

    कभी कभी आपसे बड़ी जलन होती है :)

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  6. जिसे जो चाहिए था तोड़ कर वो ले गया उनसे,
    दरख्तों को कभी इनकार करना ही नहीं आया.


    -क्या बात है राजीव...बहुत खूब!!!

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  7. जिसे जो चाहिए था तोड़ कर वो ले गया उनसे,
    दरख्तों को कभी इनकार करना ही नहीं आया.

    ये शेर सबसे खूबसूरत बन पड़ा है......

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  8. मुहब्बत का कभी इज़हार करना ही नहीं आया,
    मेरी कश्ती को दरिया पार करना ही नहीं आया.


    जिसे जो चाहिए था तोड़ कर वो ले गया उनसे,
    दरख्तों को कभी इनकार करना ही नहीं आया.
    वाह...वाह ...खूबसूरत शेर ....

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  9. मुहब्बत का कभी इज़हार करना ही नहीं आया,
    मेरी कश्ती को दरिया पार करना ही नहीं आया.

    मैं दुनिया ही का हो कर रह गया होता मगर इसको,
    मुहब्बत से कभी इसरार करना ही नहीं आया.

    मतला ता मक्ता ग़ज़ल शानदार है...... हर एक शेर बेहतरीन है. कथ्य के हिसाब से एकदम दुरुस्त...!!
    ( एक किश्ती हम भी लेकर निकले थे..... नतीजा जानने के लिए तशरीफ़ लायें singhsdm.blogspot.com)

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  10. बहुत खूब राजीव जी,
    इस शेर ने तो लाजवाब कर दिया है;
    "जिसे जो चाहिए था तोड़ कर वो ले गया उनसे,
    दरख्तों को कभी इनकार करना ही नहीं आया."

    "इधर नज़रें मिलीं और तुम उधर दिल...........", वाह वा

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  11. जिसे जो चाहिए था तोड़ कर वो ले गया उनसे,
    दरख्तों को कभी इनकार करना ही नहीं आया.
    क्या बात है ..बहुत ही खूब लिखा आपने !
    मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है : Blind Devotion - स्त्री अज्ञानी ?

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  12. जिसे जो चाहिए था तोड़ कर वो ले गया उनसे,
    दरख्तों को कभी इनकार करना ही नहीं आया.

    हमारे दोस्तों ने हाथ में खंजर थमाया भी,
    मगर दुश्मन पे हमको वार करना ही नहीं आया.

    वाह! हर शेर दिल में उतर गया! बहुत खूब!

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  13. जिसे जो चाहिए था तोड़ कर वो ले गया उनसे
    दरख्तों को कभी इनकार करना ही नहीं आया

    इस खूबसूरत शेर के लिए
    ख़ास बधाई देते हुए
    एक उम्दा ग़ज़ल के लिए
    ढेरों मुबारकबाद !!

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  14. जिसे जो चाहिए था तोड़ कर वो ले गया उनसे,
    दरख्तों को कभी इनकार करना ही नहीं आया.


    हमारे दोस्तों ने हाथ में खंजर थमाया भी,
    मगर दुश्मन पे हमको वार करना ही नहीं आया.
    वाह वाह बहुत खूबसूरत गज़ल है। शुभकामनायें।

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  15. वाह राजीव जी,
    एक ग़ज़ल में इतनी बातें कहके कहते हो
    हमें तो अपनी बात ढंग से कहना ही नहीं आया...
    आपकी इस मासूमियत के नाम 'चर्चित' का सलाम!

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  16. जिसे जो चाहिए था तोड़ कर वो ले गया उनसे,
    दरख्तों को कभी इनकार करना ही नहीं आया.

    kya bat hai !!
    waah !!
    bahut umda !!

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  17. "जिसे जो चाहिए था तोड़ कर वो ले गया उनसे,
    दरख्तों को कभी इनकार करना ही नहीं आया."

    वाह ! कितने उम्दा तरीके से बयाँ किया है ....
    तारीफ के लिए अल्फाज़ नहीं है मेरे पास...

    kusum sharma

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