शनिवार, 25 जून 2011

ग़ज़ल: हमारे ज़ख्म तो भरते दिखाई देते हैं.


जहाँ कहीं हमें दाने दिखाई देते हैं,
वहीँ पे जाल भी फैले दिखाई देते हैं.

मैं कैसे मान लूं बादल यहाँ भी बरसा है,
यहाँ तो सब मुझे प्यासे दिखाई देते हैं.

तुम्हारा दर्द भी तुमसा ही बेवफा निकला,
हमारे ज़ख्म तो भरते दिखाई देते हैं.

कभी तो चाँद को मेरी नज़र से भी देखो,
नहीं दिखेंगे जो धब्बे दिखाई देते हैं.

अगर ये हाथ बढ़ाएं तो आसमां छू लें,
जो कद में आपको छोटे दिखाई देते है.

सियासी भीड़ में उंगली उठाएं किस किस पर,
सब इस हमाम में नंगे दिखाई देते हैं.

मैं सोचता था हवा ने बुझा दिए होंगे,
मेरे चिराग तो जलते दिखाई देते हैं,

बह्रे मुज्‍तस मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ
मुफायलुन फयलातुन मुफायलुन फैलुन (1212 1122 1212 22)

25 टिप्‍पणियां:

  1. जहाँ कहीं हमें दाने दिखाई देते हैं,
    वहीँ पे जाल भी फैले दिखाई देते हैं.

    मैं कैसे मान लूं बादल यहाँ भी बरसा है,
    यहाँ तो सब मुझे प्यासे दिखाई देते हैं.

    .......वाह राजीव जी! ये हुई न बात. हर शेर एक दूसरेसे आगे निकलता हुआ..... एक नए भाव-जगत की रचना करता हुआ..... बहुत अच्छी लगी ये ग़ज़ल

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  2. कभी तो चाँद को मेरी नज़र से भी देखो,
    नहीं दिखेंगे जो धब्बे दिखाई देते हैं.

    अगर ये हाथ बढ़ाएं तो आसमां छू लें,
    जो कद में आपको छोटे दिखाई देते है.

    बहुत खूबसूरत गज़ल ..

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  3. आपने गज़ल के माध्यम से बहुत कुछ दिखा दिया।

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  4. आजकल तो भीड़ में ही लोग नंगे दिखते हैं, हमाम की बात क्‍यों की जाए.

    बहुत सुंदर रचना के लिए बधाई.

    दुनाली पर देखें
    बाप की अदालत में सचिन तेंदुलकर

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  5. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 28 - 06 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच-- 52 ..चर्चा मंच

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  6. तुम्हारा दर्द भी तुमसा ही बेवफा निकला,
    हमारे ज़ख्म तो भरते दिखाई देते हैं.
    मित्र ! बेहतरीन गजल ,पहली बार आपको पढ़ा ,गंभीरता लिए मौलिक भावों का प्रदर्शन बहुत अच्छा है, यूँ ही लिखते रहें ..... शुक्रिया जी /

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  7. जीवन की तल्ख सच्चाइयो को गज़ल मे खूब पिरोया है ्………हर शेर लाजबाव्।

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  8. जहाँ कहीं हमें दाने दिखाई देते हैं,
    वहीँ पे जाल भी फैले दिखाई देते हैं.

    मैं कैसे मान लूं बादल यहाँ भी बरसा है,
    यहाँ तो सब मुझे प्यासे दिखाई देते हैं.

    वाह ... हर एक पंक्ति बहुत खूब

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  9. मैं कैसे मान लूं बादल यहाँ भी बरसा है,
    यहाँ तो सब मुझे प्यासे दिखाई देते हैं.

    तुम्हारा दर्द भी तुमसा ही बेवफा निकला,
    हमारे ज़ख्म तो भरते दिखाई देते हैं.

    कभी तो चाँद को मेरी नज़र से भी देखो,
    नहीं दिखेंगे जो धब्बे दिखाई देते हैं.



    बेहद शानदार लाजवाब गज़ल । एक-एक शे’र लाजवाब।

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  10. मैं कैसे मान लूं बादल यहाँ भी बरसा है,
    यहाँ तो सब मुझे प्यासे दिखाई देते हैं

    सुन्दर रचना---बधाई

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  11. मैं कैसे मान लूं बादल यहाँ भी बरसा है,
    यहाँ तो सब मुझे प्यासे दिखाई देते हैं...बहुत ही बढ़िया लिखा है !
    मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है : Blind Devotion - सम्पूर्ण प्रेम...(Complete Love)

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  12. मैं कैसे मान लूं बादल यहाँ भी बरसा है,
    यहाँ तो सब मुझे प्यासे दिखाई देते हैं.


    bahut sunder shab prayojan. sunder, umda gazel.

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  13. कभी तो चाँद को मेरी नज़र से भी देखो,
    नहीं दिखेंगे जो धब्बे दिखाई देते हैं.

    शानदार रचना। भावनाओं और शब्दों में गजब का तालमेल है। पहली बार आना हुआ आपके ब्लाग पर। इतनी अच्छी रचना के लिए धन्यवाद के पात्र है।

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  14. अगर ये हाथ बढ़ाएं तो आसमां छू लें,
    जो कद में आपको छोटे दिखाई देते है...
    बहुत सुन्दर ..गंभीर भाव युक्त गजल ..आपके सुन्दर ब्लॉग के लिए शुभकामनाएं....

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  15. जहाँ कहीं हमें दाने दिखाई देते हैं,
    वहीँ पे जाल भी फैले दिखाई देते हैं.

    अगर ये हाथ बढ़ाएं तो आसमां छू लें,
    जो कद में आपको छोटे दिखाई देते है.

    वाह बेहतरीन गज़ल

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  16. शायद पहली बार आया हूँ यहाँ पर| बहुत ही खूबसूरत गजल| ये दो शेर तो बेहद उम्दा लगे

    कभी तो चाँद को मेरी नज़र से भी देखो,
    नहीं दिखेंगे जो धब्बे दिखाई देते हैं.

    अगर ये हाथ बढ़ाएं तो आसमां छू लें,
    जो कद में आपको छोटे दिखाई देते है.

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  17. वाह राजीव जी वाह,
    हर शेर बेहतरीन, जिंदाबाद ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई

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  18. kamal ki gazal hai...luved it..

    तुम्हारा दर्द भी तुमसा ही बेवफा निकला,
    हमारे ज़ख्म तो भरते दिखाई देते हैं.

    ati sunder...

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  19. आप अपनी पसंदीदा बहर में हमेशा ही कमाल करते हैं. सर से लेकर पाँव तक या कहूं कि मतले से लेकर आखिरी शेर तक, हर शेर उम्दा है.
    वो चाहे ये शेर हो, "मैं कैसे मान लूं बादल यहाँ भी बरसा है........." हो या "तुम्हारा दर्द भी तुमसा ही बेवफा निकला.........", अजब ही जादू है इन शेरों में.

    "अगर ये हाथ बढ़ाएं तो आसमां छू लें,.........", वाह वा राजीव जी, क्या खूब शेर बाँधा है, अंदाज़ बहुत अच्छा है. वाकई आपके शेर आसमां की ऊँचाइयों को छू रहे हैं.

    "सियासी भीड़ में उंगली उठाएं किस किस पर..........", मुहावरे का बहुत सुन्दर इस्तेमाल कैसे किया जाता है, ये शेर उसका बेहतरीन उधाहरण है.

    आपकी ग़ज़ल पढके ज़ेहन में एक ताजगी सी आ जाती है.

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  20. आप का बलाँग मूझे पढ कर आच्चछा लगा , मैं बी एक बलाँग खोली हू
    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/

    मै नइ हु आप सब का सपोट chheya

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  21. अगर ये हाथ बढ़ाएं तो आसमां छू लें,
    जो कद में आपको छोटे दिखाई देते है.

    Raajeev ji is murassa'ghazal ke liye mubarakbad qubool kijiye

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  22. I think the admin of this web site is in fact working
    hard in favor of his web page, because here every data is quality based material.


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