रविवार, 31 जुलाई 2011

ग़ज़ल: मेरा कहा उन्हें अच्छा मगर नहीं लगता

बुलंदियों से हमें यूँ तो डर नहीं लगता
पर आसमां पे बना घर भी घर नहीं लगता.

मैं उनके सामने सच बात कह तो देता हूँ,
मेरा कहा उन्हें अच्छा मगर नहीं लगता.

झुका के सर को अगर उसके दर पे जाते तो,
तुम्हारा इस तरह चौखट से सर नहीं लगता.

फलों से खूब लदा पेड़ है यकीनन वो,
मगर जो छांव दे, ऐसा शजर* नहीं लगता

वो राहे इश्‍क में चल तो पड़ा है, लेकिन वो,
सफर की मुश्किलों से बाखबर नहीं लगता,

हमें तो हर घड़ी पगड़ी की फ़िक्र रहती है,
वगैर इस के ये सर भी तो सर नहीं लगता.

खुदा का शुक्र है अब तक तो मेरे बच्चों पर,
नई हवा का ज़रा भी असर नहीं लगता.

-राजीव भरोल 'राज़'
 * शजर = पेड़
बह्रे मुज्‍तस मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ
मुफायलुन फयलातुन मुफायलुन फैलुन (1212 1122 1212 22)