रविवार, 31 जुलाई 2011

ग़ज़ल: मेरा कहा उन्हें अच्छा मगर नहीं लगता

बुलंदियों से हमें यूँ तो डर नहीं लगता
पर आसमां पे बना घर भी घर नहीं लगता.

मैं उनके सामने सच बात कह तो देता हूँ,
मेरा कहा उन्हें अच्छा मगर नहीं लगता.

झुका के सर को अगर उसके दर पे जाते तो,
तुम्हारा इस तरह चौखट से सर नहीं लगता.

फलों से खूब लदा पेड़ है यकीनन वो,
मगर जो छांव दे, ऐसा शजर* नहीं लगता

वो राहे इश्‍क में चल तो पड़ा है, लेकिन वो,
सफर की मुश्किलों से बाखबर नहीं लगता,

हमें तो हर घड़ी पगड़ी की फ़िक्र रहती है,
वगैर इस के ये सर भी तो सर नहीं लगता.

खुदा का शुक्र है अब तक तो मेरे बच्चों पर,
नई हवा का ज़रा भी असर नहीं लगता.

-राजीव भरोल 'राज़'
 * शजर = पेड़
बह्रे मुज्‍तस मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ
मुफायलुन फयलातुन मुफायलुन फैलुन (1212 1122 1212 22)

13 टिप्‍पणियां:

  1. झुका के सर को अगर उसके दर पे जाते तो,
    तुम्हारा इस तरह चौखट से सर नहीं लगता.


    राजीव जी आपकी गज़ल ने मन मोह लिया…………गज़ब की सोच का परिचायक है आपकी गज़ल्……………हर शेर एक सवाल भी है और एक जवाब भी……………शानदार अभिव्यक्ति।

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  2. राजीव जी
    गज़ब की लफ्ज़ अदायगी है...!!
    बुलंदियों से हमें यूँ तो डर नहीं लगता
    पर आसमां पे बना घर भी घर नहीं लगता.
    क्या मतला बुना है...... बार बार पढने को जी चाह रहा है.

    मैं उनके सामने सच बात कह तो देता हूँ,
    मेरा कहा उन्हें अच्छा मगर नहीं लगता.
    उफ्फ्फ जानलेवा शेर है ....!


    झुका के सर को अगर उसके दर पे जाते तो,
    तुम्हारा इस तरह चौखट से सर नहीं लगता.
    क्या बात है.....!!



    फलों से खूब लदा पेड़ है यकीनन वो,
    मगर जो छांव दे, ऐसा शजर* नहीं लगता


    वो राहे इश्‍क में चल तो पड़ा है, लेकिन वो,
    सफर की मुश्किलों से बाखबर नहीं लगता,


    हमें तो हर घड़ी पगड़ी की फ़िक्र रहती है,
    वगैर इस के ये सर भी तो सर नहीं लगता.


    खुदा का शुक्र है अब तक तो मेरे बच्चों पर,
    नई हवा का ज़रा भी असर नहीं लगता.
    बहुत खूब !

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  3. वाह बहुत ही सुन्दर
    रचा है आप ने
    क्या कहने ||
    लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/
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  4. झुका के सर को अगर उसके दर पे जाते तो,
    तुम्हारा इस तरह चौखट से सर नहीं लगता.

    सच में बेहतरीन।

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  5. शानदार गजल। हर शेर में वजन है।

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  6. फलों से खूब लदा पेड़ है यकीनन वो,
    मगर जो छांव दे, ऐसा शजर* नहीं लगता


    बहुत खूब बहुत खूब बहुत खूब
    मज़ा आया राजीव भाई

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  7. वो राहे इश्क़ में चल तो पड़ा है लेकिन वो,
    सफ़र की मुश्किलों से बा-ख़बर नहीं लगता।
    बेहतरीन शे"र , सुन्दर गज़ल बधाई भरोल जी।

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  8. झुका के सर को अगर उसके दर पे जाते तो,
    तुम्हारा इस तरह चौखट से सर नहीं लगता.


    सभी शेर वज़नदार है. एक अच्छे शायर की पेह्चान के रूप में दिख रहे हो.
    एक पुराना शेर भी याद आया :

    जो झुक कर आप् से मिलता होगा
    ऊसका क़द आप से ऊँचा होगा

    -मोहम्मद आज़म खान

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  9. बुलंदियों से हमें यूँ तो डर नहीं लगता
    पर आसमां पे बना घर भी घर नहीं लगता.

    बहुत ही खूबसूरत शेर से आग़ाज़ हुआ इस उम्दा ग़ज़ल का!

    खुदा का शुक्र है अब तक तो मेरे बच्चों पर,
    नई हवा का ज़रा भी असर नहीं लगता.

    बहुत खूब! खुदा करे ये हवा किसी के बच्चों को न लगे!

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  10. सरलता से बहुत अच्छी बात कही है.
    यदि मीडिया और ब्लॉग जगत में अन्ना हजारे के समाचारों की एकरसता से ऊब गए हों तो कृपया मन को झकझोरने वाले मौलिक, विचारोत्तेजक आलेख हेतु पढ़ें
    अन्ना हजारे के बहाने ...... आत्म मंथन http://sachin-why-bharat-ratna.blogspot.com/2011/08/blog-post_24.html

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  11. बुलंदियों से हमें यूँ तो डर नहीं लगता
    पर आसमां पे बना घर भी घर नहीं लगता.

    bahut umdaa matale se shuroo ho kar ghazal apni oonchaiyon ko chhoo rahi hai


    खुदा का शुक्र है अब तक तो मेरे बच्चों पर,
    नई हवा का ज़रा भी असर नहीं लगता.

    khuda kare ki bachche hamesha zamane ki tund o tez hawaon se mahfooz rahen

    bahut khoob !!

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