रविवार, 11 सितंबर 2011

ग़ज़ल: कहीं चौखट कहीं छप्पर नहीं है.

कहीं चौखट कहीं छप्पर नहीं है,
यहाँ कोई मुकम्मल घर नहीं है.

सुकूँ से पाँव फैलाऊं तो कैसे,
मेरी इतनी बड़ी चादर नहीं है.

अना के दायरे में जीते रहना,
किसी भी कैद से कमतर नहीं है.

मैं मुद्दत बाद तुमसे मिल रहा हूँ,
खुशी से आँख फिर क्यों तर नहीं है?

नज़र डाली तो है उसने इधर भी,
मगर उसकी नज़र मुझ पर नहीं है!

अजब ये संगसारी है! बज़ाहिर,
किसी के हाथ में पत्थर नहीं है.

-राजीव भरोल 'राज़'

24 टिप्‍पणियां:

  1. कहीं चौखट कहीं छप्पर नहीं है,
    यहाँ कोई मुकम्मल घर नहीं है.

    सुकूँ से पाँव फैलाऊं तो कैसे,
    मेरी इतनी बड़ी चादर नहीं है.

    waah behad shandar alfaaz dil ko chhoo gaye

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  2. बहुत सुन्दर, दिल को छू लेने वाली ग़ज़ल| धन्यवाद|

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  3. अजब ये संगसारी है! बज़ाहिर,
    किसी के हाथ में पत्थर नहीं है.
    खुबसूरत शेर , मुबारक हो भाई

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  4. कहीं चौखट कहीं छप्पर नहीं है,
    यहाँ कोई मुकम्मल घर नहीं है.

    बेजोड मतला, लाजवाब कहन, बेहतरीन ग़ज़ल

    हार्दिक बधाई

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  5. अना के दायरे में जीते रहना,
    किसी भी कैद से कमतर नहीं है!

    यह शे'र बेहद उम्दा बन पडा है ... बहुत बधाई राजीव भाई..

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  6. 31 जुलाई के बाद अब, बहुत देरी से लगाते हैं पोस्ट भाई। पूरी ग़ज़ल ही पुरअसर है, पर इस शेर की बात कुछ और ही है

    मैं मुद्दत बाद तुमसे मिल रहा हूँ,
    खुशी से आँख फिर क्यों तर नहीं है?

    अपनी वही ज़ुबान, जो कि हो हिन्दुस्तानी

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  7. नमस्कार राजीव जी,
    मतला अच्छा बना है, "अना के दायरे में........." शेर भी खूब बना है.
    लेकिन जिस शेर ने बहुत गहरा छुआ है वो "अजब ये संगसारी है! बज़ाहिर................", बहुत बड़ी बात कही है. वाह वा राजीव जी.

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  8. क्या बात है राजीव जी ... कमाल की गज़ल है ... मज़ा आ गया पढ़ के .. सुभान अल्ला ... हर शेर छू गया ...

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  9. राजीव जी
    बढ़िया ग़ज़ल.......
    मतले से ही बात बन गयी.... बाकि शेर तो बोनस में मिले....!!!
    कहीं चौखट कहीं छप्पर नहीं है,
    यहाँ कोई मुकम्मल घर नहीं है.
    और यह तो बेहद लाजवाब
    अजब ये संगसारी है! बज़ाहिर,
    किसी के हाथ में पत्थर नहीं है.
    क्या बढ़िया लहजा है.....!!!! बेहतरीन

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  10. राजीव जी अरसे बाद आपकी ग़ज़ल पढने को मिली...आनंद आ गया...बेहतरीन शेर कहें हैं...एक से बढ़ कर एक...मक्ता तो भाई जान जान लेवा है...कमाल...ढेरों दाद कबूल करें...

    नीरज

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  11. भाई राजीव भारोल जी बहुत ही खूबसूरती से आपने गज़ल कही है बहुत -बहुत बधाई और शुभकामनाएं |

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  12. बहुत ही शानदार ग़ज़ल लिखी है राजीव जी आपने. लाजवाब.

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  13. राजीव भाई ,
    हमेशा की तरह आपकी यह ग़ज़ल भी बहुत ख़ूबसूरत है …
    मुबारकबाद !



    आपको सपरिवार
    नवरात्रि पर्व की बधाई और
    शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  14. विजया दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं। बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक यह पर्व, सभी के जीवन में संपूर्णता लाये, यही प्रार्थना है परमपिता परमेश्वर से।
    नवीन सी. चतुर्वेदी

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  15. राजीव भाई
    एक बार फिर से आपकी ख़ूबसूरत ग़ज़ल पढ़ कर सुकून-ओ-मसर्रत का एहसास हुआ …


    नई ग़ज़ल का इंतज़ार है…


    और चलते चलते
    आपको सपरिवार त्यौंहारों के इस सीजन सहित दीपावली की अग्रिम बधाइयां-शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  16. अना के दायरे में जीते रहना,
    किसी भी कैद से कमतर नहीं है.

    khoobsoorat ghazal ka bahut umda sher
    bahut khoob !!

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  17. kamaal ki gazal hai. kisi ek sher5 ko kuch nahin kah sakati . badhai is laajavaab gazal ke liye.

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  18. अना के दायरे में जीते रहना,
    किसी भी कैद से कमतर नहीं है

    कमाल का शेर कहा है राजीव भी
    मेरी तरफ से ढेरों मुबारकबाद .

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  19. मैं मुद्दत बात तुमसे मिल रहा हूँ पर खुशी से आँखें तर क्यों नहीं हैं बहुत अच्छे जज्बात आपने व्यक्त किए। हार्दिक आभार

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  20. कहीं चौखट कहीं छप्पर नहीं है,
    यहाँ कोई मुकम्मल घर नहीं है.

    सुकूँ से पाँव फैलाऊं तो कैसे,
    मेरी इतनी बड़ी चादर नहीं है.
    कमाल के शब्द हैं ..बोलते हुए ..

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