सोमवार, 31 दिसंबर 2012

ग़ज़ल: नए साल में नए गुल खिलें, नई हो महक नया रंग हो

मित्रगण,
श्री पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर आयोजित नववर्ष के तरही मुशायरे में पिछले वर्ष कही गई गज़ल पेश है...


नई सोच हो नया आसमां
, नए हौसलों की उमंग हो,
नए साल में नए गुल खिलें, नई हो महक नया रंग हो.

मेरे दर पे आये फ़कीर को मेरी झोंपड़ी से न कुछ मिले,
मेरा हाथ ऐ मेरे आसमां कभी इस कदर भी न तंग हो,

कई दिन हुए मैं उठा नहीं, जा के पर्वतों से भिड़ा नहीं,
मेरे हौसलों में पड़े पड़े ही न लग गया कहीं ज़ंग हो.

तेरे तल्ख़ लहज़े कि चोट से किसी दिल का कांच चटख गया,
कहाँ लाज़िमी है तू हाथ ही में लिए हुए कोई संग हो?

मैं बुलंदियों की मिसाल था, मेरी ईंट ईंट बिखर गई,
है उरूज तो है जवाल भी, मुझे देख कर यूँ न दंग हो.

-आर.बी. 'राज़'

शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

तुम्हारे साथ मियाँ हादसा तो हो कोई


समाअतों का यहाँ सिलसिला तो हो कोई,
चलो गिला ही सही, इब्तिदा तो हो कोई.

है इंकलाब ही इस दौर की ज़रूरत अब,
पर इन्कलाब यहाँ चाहता तो हो कोई.

मैं आसमान उसे कह भी दूं मगर उसका,
बुलंदियों से कहीं वास्ता तो हो कोई.

मिलेगी तुमको भी सरकार से मदद लेकिन,
तुम्हारे साथ मियाँ हादसा तो हो कोई.

चलेगा कौन यहाँ सच के साथ? पहले यहाँ,
बिना सहारे के सीधा खड़ा तो हो कोई,

-आर.बी.'राज़'

शनिवार, 9 जून 2012

कोई झोंका तुझे छू कर गुज़र जाए तो अच्छा हो.


तेरी खुशबू फिज़ाओं में बिखर जाए तो अच्छा हो,
कोई झोंका तुझे छू कर गुज़र जाए तो अच्छा हो.

कई दिन से तसव्वुर आपका मेहमां है इस दिल में,
ये मेहमाँ और थोड़े दिन ठहर जाए तो अच्छा हो.

सफर की मुश्किलों का यूं तो कुछ शिकवा नहीं फिर भी,
मेरी मंजिल का हर रस्ता संवर जाए तो अच्छा हो.

कफस में ही अगर रहना है तो उड़ने की हसरत क्यों,
कोई आकर मेरे ये पर कतर जाये तो अच्‍छा हो.

बहुत रुसवा हुआ हूँ मैं यहाँ सच बोल कर यारो,
ये पागलपन मेरे सर से उतर जाए तो अच्छा हो.

सराबों के तअक्कुब में भटकता फिर रहा है जो,
वो भूला सुबह का अब अपने घर जाए तो अच्छा हो.

-आर. बी. 'राज़'

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

ग़ज़ल: हैरान है दरिया ये मंज़र देख कर


हैरान है दरिया ये मंज़र देख कर,
अपनी तरफ आता समंदर देख कर.

अमनो अमां पर हो रही हैं बैठकें,
बच्चे बहुत खुश हैं कबूतर देख कर.

गुज़रा हुआ इक हादसा याद आ गया,
फिर से उन्हीं हाथों में खंजर देख कर.

अबके बरस बादल भी पछताए बहुत,
सैलाब में डूबे हुए घर देख कर.

पंछी बिना दाना चुगे ही उड़ गए,
आँगन में कुछ टूटे हुए पर देख कर.

दिल को तुम्हारी याद आई यक ब यक,
पहलू में इक शीशे के, पत्थर देख कर.

-आर. बी. राज़