सोमवार, 9 अप्रैल 2012

ग़ज़ल: हैरान है दरिया ये मंज़र देख कर


हैरान है दरिया ये मंज़र देख कर,
अपनी तरफ आता समंदर देख कर.

अमनो अमां पर हो रही हैं बैठकें,
बच्चे बहुत खुश हैं कबूतर देख कर.

गुज़रा हुआ इक हादसा याद आ गया,
फिर से उन्हीं हाथों में खंजर देख कर.

अबके बरस बादल भी पछताए बहुत,
सैलाब में डूबे हुए घर देख कर.

पंछी बिना दाना चुगे ही उड़ गए,
आँगन में कुछ टूटे हुए पर देख कर.

दिल को तुम्हारी याद आई यक ब यक,
पहलू में इक शीशे के, पत्थर देख कर.

-आर. बी. राज़

15 टिप्‍पणियां:

  1. हैरान है दरिया ये मंज़र देख कर,
    अपनी तरफ आता समंदर देख कर

    वाह ....बहुत सुंदर

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  2. गुज़रा हुआ इक हादसा याद आ गया,
    फिर से उन्हीं हाथों में खंजर देख कर.
    KHOOB, BAHUT KHOOB

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  3. पंछी बिना दाना चुगे ही उड़ गए,
    आँगन में कुछ टूटे हुए पर देख कर...

    बहुत खूब ... गज़ब का शेर है राजीव जी ... उस्तादाना अंदाज़ है ...

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  4. वाह ग़ज़ल मुकम्मल हो गई है.
    बहुत खूब शेर निकाले हैं. और जिन शेरों ने जान ही निकाल दी है वो हैं,
    मतला .............अहा. लाजवाब कर दिया.
    पहला शेर "अमनो अमां पर हो रही हैं बैठकें............" वाह वा. सानी तो कमाल की है. कबूतर को बहुत खूबी से लाये हो और क्या तंज मारा है.
    "अबके बरस बादल भी पछताए बहुत,........." वाह वा. क्या पिरोया है.
    "पंछी बिना दाना चुगे ही उड़ गए..................." वाह वा

    उम्दा ग़ज़ल बनी है. बधाई स्वीकारें.

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    1. धन्यवाद अंकित. सब गुरूजी की इस्लाह ने किया है...

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  5. जिनसे उत्तर की अभिलाषा, पूछ रहे हैं प्रश्न वही दृग।

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  6. अबके बरस बादल भी पछताए बहुत,
    सैलाब में डूबे हुए घर देख कर.
    उम्दा ग़ज़ल बधाई ..........

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  7. पंछी बिना दाना चुगे ही उड़ गए,
    आँगन में कुछ टूटे हुए पर देख कर.



    उफ़ उफ़ उफ़

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  8. पंछी बिना दाना चुगे ही उड़ गए,
    आँगन में कुछ टूटे हुए पर देख कर.

    अभी तक के खूबसूरत पंक्तियो में से एक्- आज़म खान

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  9. वाह वाह........
    लाजवाब गज़ल.............
    हर शेर बढ़िया..
    अमनो अमां पर हो रही हैं बैठकें,
    बच्चे बहुत खुश हैं कबूतर देख कर.

    दाद हाज़िर है..........
    अनु

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  10. पूरी ग़ज़ल बहुत खुबसूरत है मुझे खास तौर पर ये शेर पसंद आये...

    अबके बरस बादल भी पछताए बहुत,
    सैलाब में डूबे हुए घर देख कर.

    दिल को तुम्हारी याद आई यक ब यक,
    पहलू में इक शीशे के, पत्थर देख कर.

    -kusum sharma

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  11. बहुत अच्छी गज़ल...सुंदर प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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