सोमवार, 23 दिसंबर 2013

ग़ज़ल: जुनूने शौक़ अगर है तो हिचकिचाना क्या

जुनूने शौक़ अगर है तो हिचकिचाना क्या
उतरना पार या कश्ती का डूब जाना क्या
(जुनूने शौक़ = कुछ प्राप्त करने का पागलपन)


हमारे बिन भी वही कहकहे हैं महफ़िल में
हमारा लौट के आना या उठ के जाना क्या

यही कहा है सभी से कि ख़ैरियत से हूँ
अब अपना हाल हर इक शख्स को सुनाना क्या

दिखाने को तो दिखा दूं मैं दिल के ज़ख्म मगर
मैं सोचता हूँ तेरा ज़र्फ़ आज़माना क्या
(ज़र्फ़ = सामर्थ्य/Capacity)

मुझे तो हिज्र के सदमों ने कर दिया पत्थर
तुम्हें भी भूल गया है गले लगाना क्या
(हिज्र = जुदाई)

तुम्हारे ओंठों पे रक्सां है तिश्नगी अब भी
बना दिया है समंदर ने फिर बहाना क्या
(रक्सां = नृत्यमग्न/Dancing, तिश्नगी = प्यास)

जो दिल में है वही चेहरे पे हो तो बेहतर है
दिखावे के लिए बेवज्ह मुस्कुराना क्या

दिलों के राज़ दिलों में सहेज कर रखिये
हर आशना को भला राज़दां बनाना क्या
(आशना = जान पहचान वाला, राज़दां = जिससे राज़ सांझा किये जाएँ)

जब अपनी जीत में अपनों की हार शामिल हो
तो ऐसी जीत पे ऐ दोस्त मुस्कुराना क्या

न जाने कौन सी मिट्टी के तुम बने हो 'भरोल'
तुम्हारा अब भी है उस घर में आना जाना क्या

- राजीव भरोल

बह्र : मफ़ाइलुन फ़यलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन (1 2 1 2 -1 1 2 2 – 1 2 1 2 – 2 2)

शनिवार, 23 नवंबर 2013

ग़ज़ल: बतला रहा हूँ यूं तो मैं सब कुछ सही सही

बतला रहा हूँ यूं तो मैं सब कुछ सही सही
तफ़सीले-वाक़यात मगर फिर कभी सही
( तफ़सीले-वाक़यात = Details of the events)

उसने कबूतरों को भी आज़ाद कर दिया
ख़त की उमीद छोड़ दी मैंने रही सही

वैसे तो कहने सुनने को कुछ भी नहीं मगर
मिल ही गये हैं आज तो कुछ बात ही सही

उसके भी ज़ब्तो-सब्र का कुछ एहतराम कर
जिसने तमाम उम्र तिरी बेरुख़ी सही
( ज़ब्तो-सब्र = Self control and patience, एहतराम = Respect)

इस दिल का ये मरज़ तो पुराना ही है हुज़ूर
तशखीस इस मरज़ की भले ही नयी सही
( तशखीस = Diagnosis, मरज़ = बीमारी)
 
मक़सद तो दिल का हाल जताना है दोस्तो
गर क़ूवते-बयान नहीं, खामुशी सही
 (क़ूवते-बयान = Power to express yourself, मक़सद = Goal)

पत्तों का आँधियों में बिखरना नया नहीं
इस बार आँधियों की वज़ाहत नयी सही
( वज़ाहत = Explanation)

हम आपके बग़ैर जिये और ख़ुश रहे?
अच्छा ये आप समझे हैं? अच्छा यही सही

मन का पपीहा प्यासा का प्यासा ही रह गया
क़िस्मत में इसकी प्यास ही लिक्खी हुई सही


आर बी राज़
(बह्र: मफ़ऊल फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ाइलुन 1 1 2 1 -2 1 2 1- 12 2 1- 2 1 2)

मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

ग़ज़ल: आईना ही जब झूठा हो जाता है.

आईना ही जब झूठा हो जाता है.
तब सच कहने से भी क्या हो जाता है.

अम्न की बातें इस माहौल में मत कीजे,
ऐसी बातों पे झगड़ा हो जाता है!

आँगन में इतनी बारिश भी ठीक नहीं,
पाँव फिसलने का खतरा हो जाता है.

मिलना जुलना कम ही होता है उनसे,
बात हुए भी इक अरसा हो जाता है.

आओ थोड़ा झगड़ें, कुछ तकरार करें,
इन सब से रिश्ता गहरा हो जाता है.

इतनी सी ये बात कोई समझा ही नहीं,
जिसको अपना लो, अपना हो जाता है.

जी भारी भारी सा है, रो लेते हैं, 
रो लेने से जी हल्का हो जाता है.

जादू है कुछ चारागर के हाथों में,
ऐसे थोड़ी दर्द हवा हो जाता है!

वक़्त सुखा देता है नदिया, ताल सभी,
धीरे धीरे सब सहरा हो जाता है.

-राजीव भरोल 

सोमवार, 23 सितंबर 2013

ग़ज़ल: मैं उलझा रहा अपने किरदार में

यहीं, बीवी बच्चों में, घरबार में,
मैं उलझा रहा अपने किरदार में.

जो 'कुछ-लोग' चाहेंगे, होगा वही,
छपेगा वही कल के अखबार में.

अँधेरों से सूरज के घर का पता,
यूं ही पूछ बैठा मैं बेकार में.

अजी छोड़िये बातें ईमान कीं,
हरिक चीज़ बिकती है बाज़ार में.

ख़ुशी ढूँढता है ये नादान मन,
कभी नफ़रतों में, कभी प्यार में.

है इक फ़लसफ़ा ज़िन्दगी का निहाँ,
इन्हीं ज़र्द पत्तों के अम्बार में.


-- आर बी

रविवार, 25 अगस्त 2013

ग़ज़ल: देखा जाए तो भला चाहती है.

देखा जाए तो भला चाहती है,
मेरी बीमारी दवा चाहती है.

खुद से बेज़ार हुआ चाहती है,
तीरगी एक दिया चाहती है.
(तीरगी = अँधेरा, बेज़ार = Dissatisfied)

कितनी आसाँ है हयात उनके लिए,
जिन चरागों को हवा चाहती है
(हयात = ज़िन्दगी)

डांटती है भी, तो अच्छे के लिए,
माँ है, वो थोड़ी बुरा चाहती है.

फिर से बहनों के पुराने कपड़े?
बच्ची सामान नया चाहती है!

आँधियों में भी जो रौशन हैं चराग.
इसलिए हैं, कि हवा चाहती है!

इश्क़ बुनियादी ज़रुरत है मियां,
इक तवायफ़ भी वफ़ा चाहती है.

-आर बी राज़.

बुधवार, 24 जुलाई 2013

ग़ज़ल: जाने क्या चाहती है याद उसकी

कब मुझे रास्ता दिखाती है,
रौशनी यूं ही बरगलाती है.

शाम ढलते ही लौट जाती है,
वैसे इस घर में धूप आती है.

अक्ल, बेअक्ल इस कदर भी नहीं,
फिर भी अक्सर फरेब खाती है.

जाने क्या चाहती है याद उसकी,
पास आती है, लौट जाती है.

रब्त हमको है इस ज़मीं से, हमें,
इस ज़मीं पर ही नींद आती है.

मांगता हूँ मैं खुद से खुद का हिसाब,
बेखुदी आइना दिखाती है.

किस से क्या बात कब कही जाए,
ये समझ आते आते आती है.

बात कड़वी है जाने दे, अक्सर,
बात बढ़ती है, बढ़ती जाती है.

-आर बी राज़.

बुधवार, 3 जुलाई 2013

ग़ज़ल: उस उम्र में था मेरा हर फलसफा गुलाबी

श्री पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर आयोजित होली के तरही मुशायरे में कही गई गज़ल पेश है...

आँखों में थे सितारे, हर ख़ाब था गुलाबी,
उस उम्र में था मेरा हर फलसफा गुलाबी.

मौसम शरारती है मेरी निगाहों जैसा,
है हर गुलाब तेरे, रुखसार सा गुलाबी.

फूलों को बादलों को, हो क्यों न रश्क आखिर,
गेसू घटाओं जैसे, रंग आपका गुलाबी.

बदला है कुछ न कुछ तो, कुछ तो हुआ है मुझको,
दिखता है आज कल क्यों, हर आइना गुलाबी.

होली का रंग है ये, कह दूंगा मुस्कुरा कर,
पूछा जो उसने क्यों है, चेहरा मेरा गुलाबी.



-आर.बी. 'राज़'