बुधवार, 24 जुलाई 2013

ग़ज़ल: जाने क्या चाहती है याद उसकी

कब मुझे रास्ता दिखाती है,
रौशनी यूं ही बरगलाती है.

शाम ढलते ही लौट जाती है,
वैसे इस घर में धूप आती है.

अक्ल, बेअक्ल इस कदर भी नहीं,
फिर भी अक्सर फरेब खाती है.

जाने क्या चाहती है याद उसकी,
पास आती है, लौट जाती है.

रब्त हमको है इस ज़मीं से, हमें,
इस ज़मीं पर ही नींद आती है.

मांगता हूँ मैं खुद से खुद का हिसाब,
बेखुदी आइना दिखाती है.

किस से क्या बात कब कही जाए,
ये समझ आते आते आती है.

बात कड़वी है जाने दे, अक्सर,
बात बढ़ती है, बढ़ती जाती है.

-आर बी राज़.

बुधवार, 3 जुलाई 2013

ग़ज़ल: उस उम्र में था मेरा हर फलसफा गुलाबी

श्री पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर आयोजित होली के तरही मुशायरे में कही गई गज़ल पेश है...

आँखों में थे सितारे, हर ख़ाब था गुलाबी,
उस उम्र में था मेरा हर फलसफा गुलाबी.

मौसम शरारती है मेरी निगाहों जैसा,
है हर गुलाब तेरे, रुखसार सा गुलाबी.

फूलों को बादलों को, हो क्यों न रश्क आखिर,
गेसू घटाओं जैसे, रंग आपका गुलाबी.

बदला है कुछ न कुछ तो, कुछ तो हुआ है मुझको,
दिखता है आज कल क्यों, हर आइना गुलाबी.

होली का रंग है ये, कह दूंगा मुस्कुरा कर,
पूछा जो उसने क्यों है, चेहरा मेरा गुलाबी.



-आर.बी. 'राज़'