बुधवार, 24 जुलाई 2013

ग़ज़ल: जाने क्या चाहती है याद उसकी

कब मुझे रास्ता दिखाती है,
रौशनी यूं ही बरगलाती है.

शाम ढलते ही लौट जाती है,
वैसे इस घर में धूप आती है.

अक्ल, बेअक्ल इस कदर भी नहीं,
फिर भी अक्सर फरेब खाती है.

जाने क्या चाहती है याद उसकी,
पास आती है, लौट जाती है.

रब्त हमको है इस ज़मीं से, हमें,
इस ज़मीं पर ही नींद आती है.

मांगता हूँ मैं खुद से खुद का हिसाब,
बेखुदी आइना दिखाती है.

किस से क्या बात कब कही जाए,
ये समझ आते आते आती है.

बात कड़वी है जाने दे, अक्सर,
बात बढ़ती है, बढ़ती जाती है.

-आर बी राज़.

10 टिप्‍पणियां:

  1. कितनी कुछ कर जाती है शब्दों की गूँज..

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  2. बहुत अच्छे भाव आए है,
    लिखते रहिये ..!

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  3. मतला बहुत खूब कहा है ........
    हासिल-ऐ-ग़ज़ल शेर है,
    अक्ल, बेअक्ल इस कदर भी नहीं,
    फिर भी अक्सर फरेब खाती है.

    बात कड़वी है ......... वाह

    दाद क़ुबूल करें

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  4. वाह, वाह, जनाब। बहुत खूब। दिल को छू गया।

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  5. शाम ढलते ही लौट जाती है,
    वैसे इस घर में धूप आती है.

    अक्ल, बेअक्ल इस कदर भी नहीं,
    फिर भी अक्सर फरेब खाती है.
    बात कड़वी है जाने दे, अक्सर,
    बात बढ़ती है, बढ़ती जाती है.

    बहुत बढ़िया

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  6. कल 18/09/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!


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  7. मांगता हूँ मैं खुद से खुद का हिसाब,
    बेखुदी आइना दिखाती है.----बहुत बढ़िया !
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