रविवार, 25 अगस्त 2013

ग़ज़ल: देखा जाए तो भला चाहती है.

देखा जाए तो भला चाहती है,
मेरी बीमारी दवा चाहती है.

खुद से बेज़ार हुआ चाहती है,
तीरगी एक दिया चाहती है.
(तीरगी = अँधेरा, बेज़ार = Dissatisfied)

कितनी आसाँ है हयात उनके लिए,
जिन चरागों को हवा चाहती है
(हयात = ज़िन्दगी)

डांटती है भी, तो अच्छे के लिए,
माँ है, वो थोड़ी बुरा चाहती है.

फिर से बहनों के पुराने कपड़े?
बच्ची सामान नया चाहती है!

आँधियों में भी जो रौशन हैं चराग.
इसलिए हैं, कि हवा चाहती है!

इश्क़ बुनियादी ज़रुरत है मियां,
इक तवायफ़ भी वफ़ा चाहती है.

-आर बी राज़.

16 टिप्‍पणियां:

  1. डांटती है भी, तो अच्छे के लिए,
    माँ है, वो थोड़ी बुरा चाहती है.

    फिर से बहनों के पुराने कपड़े?
    बच्ची सामान नया चाहती है!

    वाह शानदार ग़ज़ल

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    1. वंदना जी. ग़ज़ल पसंद करने के लिए धन्यवाद. आप नियमित रूप से ब्लॉग पर आती हैं उसके लिए तहे दिल से धन्यवाद.

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  2. उत्तर
    1. प्रवीण जी. धन्यावाद आप मेरे ब्लॉग पर नियमित रूप से आते हैं. बहुत बहुत धन्यवाद.

      हटाएं
  3. आप बहुत तगड़ी शैली में लिखते है साहब ! शायरी में नजाकत को जरूरी माना जाता है, पर आपकी शायरी में ये कमी नहीं खलती !

    जारी रखिये ...

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  4. डांटती है भी, तो अच्छे के लिए,
    माँ है, वो थोड़ी बुरा चाहती है.

    वाह

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  5. क्या बात. क्या बात. क्या बात....

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