सोमवार, 23 सितंबर 2013

ग़ज़ल: मैं उलझा रहा अपने किरदार में

यहीं, बीवी बच्चों में, घरबार में,
मैं उलझा रहा अपने किरदार में.

जो 'कुछ-लोग' चाहेंगे, होगा वही,
छपेगा वही कल के अखबार में.

अँधेरों से सूरज के घर का पता,
यूं ही पूछ बैठा मैं बेकार में.

अजी छोड़िये बातें ईमान कीं,
हरिक चीज़ बिकती है बाज़ार में.

ख़ुशी ढूँढता है ये नादान मन,
कभी नफ़रतों में, कभी प्यार में.

है इक फ़लसफ़ा ज़िन्दगी का निहाँ,
इन्हीं ज़र्द पत्तों के अम्बार में.


-- आर बी