सोमवार, 23 सितंबर 2013

ग़ज़ल: मैं उलझा रहा अपने किरदार में

यहीं, बीवी बच्चों में, घरबार में,
मैं उलझा रहा अपने किरदार में.

जो 'कुछ-लोग' चाहेंगे, होगा वही,
छपेगा वही कल के अखबार में.

अँधेरों से सूरज के घर का पता,
यूं ही पूछ बैठा मैं बेकार में.

अजी छोड़िये बातें ईमान कीं,
हरिक चीज़ बिकती है बाज़ार में.

ख़ुशी ढूँढता है ये नादान मन,
कभी नफ़रतों में, कभी प्यार में.

है इक फ़लसफ़ा ज़िन्दगी का निहाँ,
इन्हीं ज़र्द पत्तों के अम्बार में.


-- आर बी

16 टिप्‍पणियां:

  1. अजी छोड़िये बातें ईमान कीं,
    हरिक चीज़ बिकती है बाज़ार में.

    Bahoot khub.......

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  2. कभी कभी अपने किरदार पर भी प्रश्न उठें, डूबने का दुख कम होने लगता है।

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  3. आप की ये सुंदर रचना आने वाले सौमवार यानी 11/11/2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है...
    सूचनार्थ।



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  4. अजी छोड़िये बातें ईमान कीं,
    हरिक चीज़ बिकती है बाज़ार में.

    ख़ुशी ढूँढता है ये नादान मन,
    कभी नफ़रतों में, कभी प्यार में.
    बहुत उम्दा ग़ज़ल !
    नई पोस्ट काम अधुरा है

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    1. कालीपद प्रसाद जी. हौसला अफजाई के लिए धन्यवाद.

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  5. अँधेरों से सूरज के घर का पता,
    यूं ही पूछ बैठा मैं बेकार में
    है इक फ़लसफ़ा ज़िन्दगी का निहाँ,
    इन्हीं ज़र्द पत्तों के अम्बार में.
    वाह सर बहुत बढ़िया

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  6. नयी पुरानी हलचल का प्रयास है कि इस सुंदर रचना को अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    जिससे रचना का संदेश सभी तक पहुंचे... इसी लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 26/05/2014 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है...हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...

    [चर्चाकार का नैतिक करतव्य है कि किसी की रचना लिंक करने से पूर्व वह उस रचना के रचनाकार को इस की सूचना अवश्य दे...]
    सादर...
    चर्चाकार कुलदीप ठाकुर
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  7. सुन्दर रचना , बाजार चीजों के बिकने के लिए ही तो है फिर काहे की उलझन

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