शनिवार, 23 नवंबर 2013

ग़ज़ल: बतला रहा हूँ यूं तो मैं सब कुछ सही सही

बतला रहा हूँ यूं तो मैं सब कुछ सही सही
तफ़सीले-वाक़यात मगर फिर कभी सही
( तफ़सीले-वाक़यात = Details of the events)

उसने कबूतरों को भी आज़ाद कर दिया
ख़त की उमीद छोड़ दी मैंने रही सही

वैसे तो कहने सुनने को कुछ भी नहीं मगर
मिल ही गये हैं आज तो कुछ बात ही सही

उसके भी ज़ब्तो-सब्र का कुछ एहतराम कर
जिसने तमाम उम्र तिरी बेरुख़ी सही
( ज़ब्तो-सब्र = Self control and patience, एहतराम = Respect)

इस दिल का ये मरज़ तो पुराना ही है हुज़ूर
तशखीस इस मरज़ की भले ही नयी सही
( तशखीस = Diagnosis, मरज़ = बीमारी)
 
मक़सद तो दिल का हाल जताना है दोस्तो
गर क़ूवते-बयान नहीं, खामुशी सही
 (क़ूवते-बयान = Power to express yourself, मक़सद = Goal)

पत्तों का आँधियों में बिखरना नया नहीं
इस बार आँधियों की वज़ाहत नयी सही
( वज़ाहत = Explanation)

हम आपके बग़ैर जिये और ख़ुश रहे?
अच्छा ये आप समझे हैं? अच्छा यही सही

मन का पपीहा प्यासा का प्यासा ही रह गया
क़िस्मत में इसकी प्यास ही लिक्खी हुई सही


आर बी राज़
(बह्र: मफ़ऊल फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ाइलुन 1 1 2 1 -2 1 2 1- 12 2 1- 2 1 2)

4 टिप्‍पणियां:

  1. आप की ये सुंदर रचना आने वाले सौमवार यानी 25/11/2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है...
    सूचनार्थ।

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    1. जी शुक्रिया. मैंने ग्रुप की सदस्यता ले ली है.

      हटाएं

  2. उसके भी ज़ब्तो-सब्र का कुछ एहतराम कर
    जिसने तमाम उम्र तिरी बेरुख़ी सही
    पत्तों का आँधियों में बिखरना नया नहीं
    इस बार आँधियों की वज़ाहत नयी सही

    वाह सर बहुत बढ़िया अशआर ....बहुत बहुत बधाई

    उत्तर देंहटाएं

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