गुरुवार, 7 अगस्त 2014

ग़ज़ल: मगर फिर भी हम मुस्कुराते बहुत थे

मुख़्तसर सी एक पुरानी ग़ज़ल आपकी समाअतों की नज्र..

वतन, गाँव, घर याद आते बहुत थे
मगर फिर भी हम मुस्कुराते बहुत थे

मेरे क़त्ल का शक गया दोस्तों पर
वही मेरे घर आते जाते बहुत थे

सराबों को वो सामने रख के अक्सर
मेरी तिश्नगी आज़माते बहुत थे
(सराब=मृगतृष्णा, तिश्नगी=प्यास)

हम अपने ही घर में सवालों के डर से
परेशानियों को छुपाते बहुत थे

था जब तक ये ईमान का बोझ सर पे
क़दम जाने क्यों लड़खड़ाते बहुत थे


-राजीव भरोल