गुरुवार, 7 अगस्त 2014

ग़ज़ल: मगर फिर भी हम मुस्कुराते बहुत थे

मुख़्तसर सी एक पुरानी ग़ज़ल आपकी समाअतों की नज्र..

वतन, गाँव, घर याद आते बहुत थे
मगर फिर भी हम मुस्कुराते बहुत थे

मेरे क़त्ल का शक गया दोस्तों पर
वही मेरे घर आते जाते बहुत थे

सराबों को वो सामने रख के अक्सर
मेरी तिश्नगी आज़माते बहुत थे
(सराब=मृगतृष्णा, तिश्नगी=प्यास)

हम अपने ही घर में सवालों के डर से
परेशानियों को छुपाते बहुत थे

था जब तक ये ईमान का बोझ सर पे
क़दम जाने क्यों लड़खड़ाते बहुत थे


-राजीव भरोल 

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपका ब्लॉग पढ़कर अच्छा लगा. अंतरजाल पर हिंदी समृधि के लिए किया जा रहा आपका प्रयास सराहनीय है. कृपया अपने ब्लॉग को “ब्लॉगप्रहरी:एग्रीगेटर व हिंदी सोशल नेटवर्क” से जोड़ कर अधिक से अधिक पाठकों तक पहुचाएं. ब्लॉगप्रहरी भारत का सबसे आधुनिक और सम्पूर्ण ब्लॉग मंच है. ब्लॉगप्रहरी ब्लॉग डायरेक्टरी, माइक्रो ब्लॉग, सोशल नेटवर्क, ब्लॉग रैंकिंग, एग्रीगेटर और ब्लॉग से आमदनी की सुविधाओं के साथ एक सम्पूर्ण मंच प्रदान करता है.
    अपने ब्लॉग को ब्लॉगप्रहरी से जोड़ने के लिए, यहाँ क्लिक करें http://www.blogprahari.com/add-your-blog अथवा पंजीयन करें http://www.blogprahari.com/signup .
    अतार्जाल पर हिंदी को समृद्ध और सशक्त बनाने की हमारी प्रतिबद्धता आपके सहयोग के बिना पूरी नहीं हो सकती.
    मोडरेटर
    ब्लॉगप्रहरी नेटवर्क

    उत्तर देंहटाएं
  2. सराबों को वो सामने रख के अक्सर
    मेरी तिश्नगी आज़माते बहुत थे

    बहुत खूब ...
    बढ़िया ग़ज़ल आदरणीय

    उत्तर देंहटाएं
  3. उम्दा और बेहतरीन... आप को स्वतंत्रता दिवस की बहुत-बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ

    उत्तर देंहटाएं
  4. सराबों को वो सामने रख के अक्सर
    मेरी तिश्नगी आज़माते बहुत थे
    Bahut khub Rajeev ji!

    उत्तर देंहटाएं
  5. नमस्कार
    मैंने एक हिन्दी काव्य संकलन नामक ब्लॉग बनाया है,जिन पर साहित्यकारों की रचनाओं के संकलित किया जा रहा है,यदि आप की भी कुछ ग़ज़लें वहाँ होती तो ब्लॉग की सुंदरता बढ़ जाती.एक बार अवलोकन कर कुछ रचनाये भेजे जो आपके परिचय के साथ प्रकाशित की जायेगी .आपके पेज पर कुछ उच्च कोटि की बेहतरीन ग़ज़लें हैं,वहाँ से भी संकलित की जा सकती है...एक बार अवलोकन करे.आप लोगो जैसे साहित्यकारों का योगदान चाहिए.
    http://kavysanklan.blogspot.ae/
    आपका स्नेहकांक्षी
    rajendra651@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं
  6. एक वक़्त बाद यहाँ लौटना हुआ, ये शेर पसंद आया।

    हम अपने ही घर में सवालों के डर से
    परेशानियों को छुपाते बहुत थे

    उम्मीद है जल्द ही कोई नई ग़ज़ल महकेगी यहाँ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. अनुपम प्रस्तुति....आपको और समस्त ब्लॉगर मित्रों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं...
    नयी पोस्ट@बड़ी मुश्किल है बोलो क्या बताएं

    उत्तर देंहटाएं
  8. एक से बढ़ कर एक अशार
    हम अपने ही------
    सराबों को----
    लाजवाब। राजिव जी आजकल मई भी अमेरिका में हूँ कयू पर्तीनो में।

    उत्तर देंहटाएं
  9. "सराबों को वो सामने रख के अक्सर
    मेरी तिश्नगी आज़माते बहुत थे"
    मासाल्लाह! क्या खुब कहा है।

    उत्तर देंहटाएं
  10. या खुदा ... ये तो आम शेर नहीं ... ये तो बकौल उस्ताद गालिब ... "नवाए सरोश है" -

    "हम अपने ही घर में सवालों के डर से
    परेशानियों को छुपाते बहुत थे

    था जब तक ये ईमान का बोझ सर पे
    क़दम जाने क्यों लड़खड़ाते बहुत थे"

    उत्तर देंहटाएं

आपको यह पोस्ट कैसी लगी? अपनी पसंद या नापसंद अवश्य बताएं.