सोमवार, 10 नवंबर 2014

ग़ज़ल: अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं.

दीपावली के अवसर पर श्री पंकज सुबीर जी द्वारा आयोजित, तरही मुशायरे में कही गई मेरी यह ग़ज़ल, आप सब की नज्र:


उसे उसी की ये कड़वी दवा पिलाते हैं,
चल आइने को ज़रा आइना दिखाते हैं.

गुज़र तो जाते हैं बादल ग़मों के भी लेकिन,
हसीन चेहरों पे आज़ार छोड़ जाते हैं.
(आज़ार = दर्द/तकलीफ़)

खुद अपने ज़र्फ़ पे क्यों इस कदर भरोसा है,
कभी ये सोचा की खुद को भी आजमाते हैं?
(ज़र्फ़ = सामर्थ्य/capacity)

वो एक शख्स जो हम सब को भूल बैठा है,
मैं सोचता हूँ उसे हम भी भूल जाते हैं.

अगर किसी को कोई वास्ता नहीं मुझसे,
तो मेरी ओर ये पत्थर कहाँ से आते हैं.

तुम्हारी यादों की बगिया में है नमी इतनी,
टहलने निकलें तो पल भर में भीग जाते हैं.

तेरी चुनर के सितारों की याद आती है,
अँधेरी रात में जब दीप झिलमिलाते हैं.

अब इस कदर भी तो भोले नहीं हो तुम 'राजीव',
तुम्हें भी सारे इशारे समझ तो आते हैं.



बह्रे मुज्‍तस मुसम्मन् मख्बून मक्तुअ
मुफायलुन फयलातुन मुफायलुन फैलुन (1212 1122 1212 22)