रविवार, 30 अगस्त 2015

ग़ज़ल: ग़र्क होकर भी उभर सकता हूँ मैं

आपकी इमदाद कर सकता हूँ मैं    (इमदाद = सहायता, मदद)
अपने पर खुद भी क़तर सकता हूँ मैं

जिस्म ही थोड़ी हूँ मैं इक सोच हूँ
गर्क हो कर भी उभर सकता हूँ मैं

इक फकत कच्चे घड़े के साथ भी
पार दरिया के उतर सकता हूँ मैं

बाँध कर मुट्ठी में रखियेगा मुझे
खोल दोगे तो बिखर सकता हूँ मैं

कह तो पाऊँगा नहीं कुछ फिर भी क्या
आप से इक बात कर सकता हूँ मैं


 -राजीव भरोल 

6 टिप्‍पणियां:


  1. जिस्म ही थोड़ी हूँ मैं इक सोच हूँ
    गर्क हो कर भी उभर सकता हूँ मैं

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  2. इन चाहतों पे दिल का,अगर इख़्तियार होता,
    न ये बेकरारी होती, न इन्तिज़ार होता.

    गिरेबान कह रहा है, दीवानगी नहीं है,
    वाकई जो इश्क होता, ये तार तार होता.

    तेरी बेरुखी ने सब कुछ, कह दिया था, सच है,
    पर होश ही कहाँ था, जो मैं होशियार होता.

    दोस्तों की उसको, कमी कभी नहीं थी,
    ख्वाहिश यही रही की, कोई राजदार होता.

    मछली की आंख हम भी, तो बेंध दिए होते,
    महबूब के हाथो में जो,स्वयंवर का हार होता,

    ‘राजीव’ भी लगता है, बेकार घूमता है,
    ग़ज़लें कहाँ वो कहता, अगर रोज़गार होता.

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  3. एक युग बीत गया यूँ चाहत को चाहते
    हम दिशा हीन थे यूँ चादर फैलाते ,
    ओढ़ कर जब सर छुपाया हमने
    अँधेरा दिल का न छुपाया हमने .
    तुम सोचते हो हममे ये गुण कैसा
    छुपाये न छुपे ये आशियाँ कैसा ,
    ज़माने को टटोलते हुए यूँ दिन गुज़ारे
    पर ,
    मिल न सके दिलों के चिराग हमारे .

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  4. आपकी इमदाद कर सकता हूँ मै
    अपने पर खुद भी क़तर सकता हूँ मै ........... वाकई दिलचश्प है आपकी यह ग़ज़ल ..ऐसी ही ग़ज़लें अब आप हिंदी कि पहली ब्लॉगिंग व सोशल वेबसाइट शब्दनगरी पर भी लिख सकतें हैं....

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  5. आपकी इमदाद कर सकता हूँ मै
    अपने पर खुद भी क़तर सकता हूँ मै ........... वाकई दिलचश्प है आपकी यह ग़ज़ल ..ऐसी ही ग़ज़लें अब आप हिंदी कि पहली ब्लॉगिंग व सोशल वेबसाइट शब्दनगरी पर भी लिख सकतें हैं....

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