बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

ग़ज़ल: तुम्हें महलों में भी बस्ती पुरानी याद आयेगी

पुराने दोस्तों की मेज़बानी याद आयेगी
तुम्हें महलों में भी बस्ती पुरानी याद आयेगी

वो फुर्सत की दुपहरी और वो फरमाइशी नगमे
तुम्हें परदेस में आकाशवाणी याद आएगी

समंदर का सुकूं बेचैन कर देगा तुम्हें जिस दिन
नदी की शोख लहरों की रवानी याद आएगी

फकीरी सल्त्नत है हम फकीरों की तुम्हें इक दिन
हमारी सल्तनत की राजधानी याद आएगी

कभी जब आसमानों की हदों का ज़िक्र होगा तो
थके हारे परिंदों की कहानी याद आएगी

गले लग जाएगा आकर वो इक दिन देख लेना तुम
उसे खुद दी हुई अपनी निशानी याद आएगी

-राजीव भरोल

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना आज के "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 02 मार्च 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. आईना को ही फ़र्ज़ी बताने लगे
    आइना से कभी सामना हो गया

    रहबरी भी तिजारत हुई आजकल
    जिसका मक़सद ही बस लूटना हो गया

    जिसको देखा नहीं जिसको जाना नहीं
    क्या कहें ,दिल उसी पे फ़ना हो गया

    रफ़्ता रफ़्ता वो जब याद आने लगे
    बेख़ुदी में ख़ुदी भूलना हो गया

    रंग चेहरे का ’आनन’ उड़ा किसलिए ?
    ख़ुद का ख़ुद से कहीं सामना हो गया ?

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